47 वर्षों के बाद भी दोषी नाबालिग से गैंगरेप, कोर्ट ने कम की सजा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1979 में नाबालिग के साथ गैंगरेप में आरोपी को दोषी ठहराने का फ़ैसला बरकरार रखा लेकिन उसकी कैद की सज़ा को साढ़े सात साल से घटाकर चार साल कठोर कारावास कर दिया. दोषी अब 71 वर्ष का है.

सौजन्य से:- ETV Bharat
नाबालिग से गैंगरेप में 47 साल बाद दोषी ठहराने का फ़ैसला बरकरार, 71 वर्षीय दोषी की कैद घटाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला, कैद को साढ़े सात साल से घटाकर चार साल कठोर कारावास कर दिया.
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : July 16, 2026 at 10:00 AM IST
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1979 में नाबालिग के साथ गैंगरेप में आरोपी को दोषी ठहराने का फ़ैसला बरकरार रखा लेकिन उसकी कैद की सज़ा को साढ़े सात साल से घटाकर चार साल कठोर कारावास कर दिया.
यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष ने आपराधिक अपील के 43 साल से लंबित रहने और दोषी की उम्र 71 साल होने को ध्यान में रखते हुए दिया है. कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से मंज़ूर करते हुए दोषी को सरेंडर करने और बची हुई सज़ा काटने का निर्देश दिया है.
मामले के तथ्यों के अनुसार वर्ष 1979 में नाबालिग पीड़िता का काली चरण, राम लाल और राम स्वरूप ने चाकू की नोक पर अपहरण कर लिया। उसे ट्रेन से शाहजहांपुर होते हुए तिलहर के एक खाली घर में ले जाया गया, जहां उसे एक सप्ताह तक बंधक बनाकर रखा और बार-बार गैंगरेप किया.
इसके बाद उसे मेला दिखाने के लिए बिल्संडा लाया गया, जहां एक सब-इंस्पेक्टर ने उसे बचाया. इसके बाद तीनों आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल की गई. वर्ष 1983 में पीलीभीत सेशन कोर्ट ने तीनों को दोषी पाते हुए उन्हें अधिकतम साढ़े सात साल कैद की सज़ा सुनाई. दोषियों ने हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती दी.
अपील लंबित रहने के दौरान कालीचरण व रामलाल की मौत हो गई. जीवित बचा राम स्वरूप ट्रायल के समय 27 साल का थे और अब 71 साल का हो गया. अपील पर सुनवाई के दौरान सजा की अवधि पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए प्रोबेशन का लाभ देने की प्रार्थना की गई. कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में, जहां पीड़ित की गवाही दोषसिद्धि का आधार होती है, दोषी के प्रति अत्यधिक सहानुभूति दिखाना न्याय का घोर उल्लंघन होगा.
कोर्ट ने कहा कि सज़ा देना केवल बदला लेने की प्रक्रिया नहीं है, इसका मकसद अपराधी और दूसरों के लिए सबक होना चाहिए और कमज़ोर लोगों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने वालों की मंशा को भी दिखाना चाहिए. अपराध को जघन्य बताते हुए कोर्ट ने कहा कि यौन हिंसा का सामाजिक असर बहुत गहरा होता है। इतने गंभीर मामले में प्रोबेशन का लाभ देना सामाजिक हित और आपराधिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा.
हालांकि कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 376 अदालतों को पर्याप्त और विशेष कारणों से सज़ा को कानून में तय सात साल की न्यूनतम अवधि से कम करने की इजाज़त देती थी. कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि घटना 1979 यानी लगभग 47 साल पुरानी है और हाईकोर्ट में अपील लगभग 43 साल से लंबित रही है, जिसमें अपीलार्थी की कोई गलती नहीं थी. वह ट्रायल के समय लगभग 27 साल का था और अब लगभग 71 साल का है. रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे पता चले कि इस घटना से पहले या बाद में किसी अन्य आपराधिक मामले में शामिल रहा हो.
इन हालात के कुल असर को देखते हुए और इस बात से संतुष्ट होकर कि यह आईपीसी की धारा 376(1) के प्रावधान के तहत पर्याप्त और विशेष कारण हैं, कोर्ट ने कहा कि भले ही दोषी ठहराने का फ़ैसला बरकरार रखा जाए लेकिन मुख्य सज़ा को कम किया जाना चाहिए. कोर्ट ने राम स्वरूप की सज़ा साढ़े सात साल कैद को घटाकर चार साल कठोर कैद कर लिया.
आईपीसी की धारा 363 व 366 के तहत साथ चलने वाली दो साल कैद पर कोर्ट ने 1983 की ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई एक अहम गलती की ओर इशारा किया. कहा कि पीलीभीत ट्रायल कोर्ट आईपीसी की धारा 363, 366 और 376 के तहत जेल की सज़ा के साथ अनिवार्य जुर्माना लगाने में नाकाम रही थी. राज्य या पीड़ित ने सज़ा बढ़ाने के लिए अपील नहीं की थी इसलिए हाईकोर्ट आरोपी के नुकसान के लिए उस गलती को ठीक नहीं कर सकता.
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