Will और उत्तराधिकार विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत के प्रमाण पत्र को चुनौती देने की नई समय सीमा तय की!
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में प्रोबेट रद्द करने के लिए कोई विशेष समय-सीमा नहीं दी गई है, लेकिन लिमिटेशन एक्ट, 1963 के अनुच्छेद 137 के तहत, अब प्रोबेट को रद्द कराने के लिए दायर याचिका तीन वर्ष की निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल करनी होगी।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट के सामने आए एक वसीयत विवाद में अदालत ने फैसला दिया है कि प्रोबेट को रद्द कराने के लिए दायर याचिका तीन वर्ष की निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल करनी होगी।
नई दिल्ली: यह खबर वसीयत से जुड़े विवादों के मामले में बड़ी काम की है। सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत यानी Will और उसके प्रमाणीकरण यानी Probate से जुड़े मामलों में एक अहम कानूनी सिद्धांत को साफ किया है। । सुप्रीम कोर्ट के सामने आए एक वसीयत विवाद में अदालत ने फैसला दिया है कि प्रोबेट को रद्द कराने के लिए दायर याचिका तीन वर्ष की निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल करनी होगी। शीर्ष अदालत का यह फैसला उन सभी वसीयत या उत्तराधिकार से जुड़े विवादों में निर्णायक साबित होगा जहां, वसीयत के प्रोबेट को सालों बाद चुनौती दी गई है।
क्या था संपत्ति और वसीयत का पूरा विवाद?
यह फैसला Dhiraj Dutta v. Anirban Sen & Others मामले में आया। इसका विवाद मामला गौरीप्रोवा सेन नामक महिला की संपत्तियों से जुड़ा था। उन्होंने 9 जुलाई 1989 को एक वसीयत बनाई थी, जिसमें अपने भतीजे धीरज दत्ता को वसीयत का निष्पादक और एकमात्र लाभार्थी नियुक्त किया था। इस वसीयत का प्रोबेट सितंबर 1995 में सक्षम अदालत द्वारा जारी कर दिया गया था। इसके बाद धीरज दत्ता ने संपत्ति के नामांतरण यानी म्यूटेशन की प्रक्रिया शुरू की। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, गौरीप्रोवा सेन की वसीयत के प्रोबेट, जिसे सितंबर 1995 में ही अदालत ने जारी कर दिया था, 23 साल बाद आपत्ति दर्ज करायी गयी। प्रतिवादियों का दावा था कि उन्हें प्रोबेट के बारे में पहली बार वर्ष 2019 में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने संपत्ति संबंधी मुकदमा दायर किया और वर्ष 2022 में प्रोबेट रद्द कराने के लिए आवेदन दाखिल किया।
सुप्रीम सुनवाई और वसीयत विवाद का फैसला
वसीयत के प्रोबेट के रद्द कराने का यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ के सामने आया।
अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को किसी न्यायिक या राजस्व कार्यवाही से संबंधित नोटिस प्राप्त होता है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह यह जानने का प्रयास करे कि नोटिस किस कारण से भेजा गया है। अदालत ने माना कि नामांतरण कार्यवाही का नोटिस प्रतिवादियों के लिए रचनात्मक सूचना था। इसलिए वे यह नहीं कह सकते कि उन्हें वर्षों तक प्रोबेट की जानकारी नहीं थी।
फिर पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को ऐसी कार्यवाही की जानकारी मिल जाती है, तो उसके बाद उसे संबंधित दस्तावेजों और आदेशों की जांच करनी चाहिए। केवल यह कहना कि वास्तविक जानकारी बाद में मिली, लिमिटेशन की गणना को आगे नहीं बढ़ा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में यह देखा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में प्रोबेट रद्द करने के लिए कोई विशेष समय-सीमा नहीं दी गई है। इसीलिए ऐसे मामलों में लिमिटेशन एक्ट, 1963 के अनुच्छेद 137 का प्रयोग किया जाएगा, जो अन्य प्रकार के आवेदन दाखिल करने के लिए तीन वर्ष की अवधि निर्धारित करता है।
अदालत ने माना कि प्रतिवादियों को नामांतरण कार्यवाही के दौरान ही पर्याप्त जानकारी मिल चुकी थी, इसलिए 2022 में दायर आवेदन समय-सीमा से बाहर था। चूंकि Indian Succession Act, 1925 में प्रोबेट रद्द करने के लिए कोई अलग समय-सीमा तय नहीं है, इसलिए Article 137 of the Limitation Act, 1963 लागू होगा, जो तीन साल की सीमा निर्धारित करता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ
आखिर में शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी वसीयत के आधार पर प्रोबेट जारी हो चुका है, तो उसे अनिश्चितकाल तक चुनौती नहीं दी जा सकती। प्रोबेट रद्द कराने के लिए आमतौर पर 3 साल के भीतर कार्रवाई करनी होगी। लंबे समय तक चुप रहने के बाद अचानक दायर की गई याचिकाओं को अदालत खारिज कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वसीयत संबंधी विवादों में कानूनी अधिकारों का प्रयोग समय रहते करना जरूरी है। प्रोबेट मिलने के बाद उसे चुनौती देने के लिए सामान्यतः तीन साल की सीमा लागू होगी, जिससे उत्तराधिकार मामलों में निश्चितता और अंतिमता बनी रहे। इस मामले में गौर करने वाली बात यह है कि यह फैसला उस सिद्धांत को नहीं बदलता कि कई परिस्थितियों में प्रोबेट प्राप्त करने के लिए आवेदन स्वयं लंबे समय बाद भी किया जा सकता है, क्योंकि उसके लिए अलग कानूनी सिद्धांत लागू होते हैं। मेरी सलाह है कि वसीयत से जुड़े मामलों में लापरवाही ठीक नहीं है। जरा सी लापरवाही आपके उत्तराधिकारी या लाभार्थियों का बड़ा नुकसान करा सकती है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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