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हिंदू परिवार की सहदायिक संपत्ति में बेटियों को मिलता है बराबर हिस्सा

2005 के हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम के बाद बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में पुत्रों के समान अधिकार और दायित्व प्राप्त हैं, चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होने पर भी बेटी को क्लास I वारिसों में से एक-एक हिस्सा मिलता है, और यदि उसका हिस्सा नहीं दिया जाता तो वह न्यायालय में अपने हक़ की माँग कर सकती है।

27 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
हिंदू परिवार की सहदायिक संपत्ति में बेटियों को मिलता है बराबर हिस्सा

सौजन्य से:- Navbharat Times

बेटियों का हक और पुश्तैनी संपत्ति

यदि संपत्ति मिताक्षरा संयुक्त हिंदू परिवार की सह-दायिक संपत्ति है, तो बेटी हमवारिस के रूप में बेटे के बराबर अधिकार रखती है। इसका अर्थ है कि बेटी को केवल इसलिए कम हिस्सा नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह बेटी है या उसकी शादी हो चुकी है।

साल 2005 के कानूनी संशोधन और बेटियों के अधिकार

- हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने धारा 6 में संशोधन के बाद बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में पुत्रों के समान अधिकार और दायित्व प्रदान किए हैं। नये नियम 9 सितंबर 2005 से लागू हुआ। इसकी कुछ बातों को जानना जरूरी है।

- जन्मसिद्ध सहदायिक : बेटी अब बेटे की तरह जन्म से ही परिवार की सहदायिक बनती है।

- समान अधिकार और दायित्व : संपत्ति में बेटी को वही अधिकार और जिम्मेदारियां मिलती हैं जो एक बेटे को मिलती हैं।

- वैवाहिक स्थिति का प्रभाव नहीं: बेटी की शादी होने के बाद भी पैतृक संपत्ति में उसका सहदायिक अधिकार खत्म नहीं होता।

- पिता का जीवित होना अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट (विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा , 2020) ने यह भी स्पष्ट किया कि 9 सितंबर 2005 को पिता का जीवित होना जरूरी नहीं है; यदि पिता की मृत्यु उससे पहले भी हुई हो, तब भी बेटी बराबर हिस्सा मांग सकती है।

क्या शादी के बाद बेटी का पैतृक संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है?

शादी होने से बेटियों का अधिकार समाप्त नहीं होता। कानून ने बेटी और बेटे को सह-दायिक संपत्ति में समान अधिकार और समान देनदारियां दी हैं। हालांकि संपत्ति के बंटवारे, पहले से हुई वैध विभाजन या किसी अन्य कानूनी हस्तांतरण का प्रभाव अलग से जांचना पड़ सकता है।

पिता की मृत्यु बिना वसीयत हो तो बेटी का क्या अधिकार है?

यह स्थिति सह-दायिक संपत्ति से अलग उत्तराधिकार के नियम भी पैदा कर सकती है। Hindu Succession Act के अनुसार किसी हिंदू पुरुष की मृत्यु बिना वसीयत होने पर उसकी संपत्ति Class I उत्तराधिकारियों को जाती है और बेटे तथा बेटी प्रत्येक को एक-एक शेयर मिलता है, साथ में कानून में बताए गए अन्य Class I वारिसों के अधिकार भी देखे जाते हैं।

क्या बेटी अपना हिस्सा मांगने के लिए कोर्ट जा सकती है?

यदि बेटी का वैधानिक हिस्सा नहीं दिया जा रहा है, तो परिस्थितियों के अनुसार वह पार्टीशन और अपने अधिकार की घोषणा के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का रुख कर सकती है। मामले में जमीन के रिकॉर्ड, टाइटल डॉक्यूमेंट्स, पुराने बंटवारे के दस्तावेज़, फ़ैमिली ट्री और संपत्ति की प्रकृति जैसे दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अदालत पहले यह निर्धारित कर सकती है कि संबंधित संपत्ति वास्तव में पुश्तैनी संपत्ति है और फिर संबंधित पक्षों के वैधानिक हिस्से तय किए जा सकते हैं। किसी पुराने बिक्री विलेख, उपहार, विभाजन या अदालती आदेश का प्रभाव भी मामले के तथ्यों और कानून के अनुसार अलग से देखा जाएगा।

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Disclaimer : यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। किसी वास्तविक विवाद या मसले में लागू और संशोधित कानूनी प्रावधानों की जांच और संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर योग्य वकील से व्यक्तिगत राय लेना उचित है।

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