सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2016 के फैसले को रद्द किया, दीर्घकालिक आग नियंत्रण के लिए नई रणनीति की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग के मामले में एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2016 के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने हाईकोर्ट को नए सिरे से मामले की समीक्षा करने और आधुनिक तकनीक, उपग्रह निगरानी, डिजिटल अलर्ट और वैज्ञानिक प्रणालियों के अधिक प्रभावी उपयोग पर जोर देते हुए नए निर्देश जारी करने को कहा है।

सौजन्य से:- Down to Earth- Hindi
जंगलउत्तराखंड: धधकते जंगलों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हाईकोर्ट के 2016 के फैसले को किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साल दर साल लगती आग की चुनौती से निपटने के लिए बदलती परिस्थितियों, आधुनिक तकनीक और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप नई रणनीति तथा नियमित निगरानी जरूरी है।
सारांश
- उत्तराखंड के जंगलों में हर साल लगने वाली आग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2016 के आदेश को रद्द कर दिया है।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि करीब एक दशक पुराने निर्देश आज की परिस्थितियों में पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि इस दौरान तकनीक, वनाग्नि प्रबंधन के तरीके और जमीनी हालात में बड़ा बदलाव आ चुका है।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई निर्देशों का पालन होने के बावजूद जंगलों में आग की घटनाएं लगातार जारी हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि केवल पुराने आदेश या अतिरिक्त मानवबल समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
- अदालत ने आधुनिक तकनीक, उपग्रह निगरानी, डिजिटल अलर्ट और वैज्ञानिक प्रणालियों के अधिक प्रभावी उपयोग पर जोर देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट को पूरे मामले की नए सिरे से समीक्षा करने और जरूरत के अनुसार नए निर्देश जारी करने को कहा है। साथ ही नियमित निगरानी की जिम्मेदारी भी हाईकोर्ट को सौंपी गई है।
- यह फैसला संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन और बार-बार सामने आने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए नीतियों और न्यायिक निर्देशों को समय-समय पर अपडेट करना, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनाना और उसकी सतत निगरानी करना ही सबसे प्रभावी रास्ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के जंगलों में साल दर साल लगने वाली आग के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट द्वारा 2016 में दिए फैसले को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह पिछले एक दशक में हुए बदलावों, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मामले पर नए सिरे से विचार करे और जरूरत पड़ने पर नए निर्देश जारी करे।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे उपायों पर नियमित निगरानी करने का भी आदेश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची और न्यायमूर्ति वी मोहन की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने एक दशक पहले वनाग्नि को रोकने के लिए कई व्यापक निर्देश दिए थे, लेकिन 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक के कारण उन निर्देशों के प्रभाव और उनके क्रियान्वयन का सही आकलन कभी नहीं हो सका।
क्यों रद्द करना पड़ा हाईकोर्ट का 10 साल पुराना फैसला?
शीर्ष अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से ऐसा प्रतीत होता है कि उच्च न्यायालय के इस विवादित फैसले में दिए कई निर्देशों का उत्तराखंड और केंद्र सरकार ने काफी हद तक पालन कर लिया है। हालांकि, इसके बावजूद हर साल जंगलों में आग की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
साथ ही, वनाग्नि प्रबंधन से जुड़े धन के दुरुपयोग, गलत इस्तेमाल, संसाधनों के भटकाव और संबंधित अधिकारियों की प्रतिबद्धता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं।
अब व्यावहारिक नहीं 10 साल पुराना आदेश
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि करीब एक दशक से स्थगित पड़े हाईकोर्ट के निर्देशों की मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार दोबारा समीक्षा की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पिछले करीब एक दशक में जमीनी स्तर पर काफी बदलाव आए हैं। अब जंगलों में लगने वाली आग की पहचान और नियंत्रण के लिए आधुनिक तकनीक, उपग्रह निगरानी, डिजिटल अलर्ट और वैज्ञानिक प्रणालियां पहले की तुलना में कहीं अधिक विकसित हो चुकी हैं।
ऐसे में इस पर फिर से विचार करने की जरूरत है कि केवल मानव संसाधन बढ़ाने पर जोर दिया जाए या आधुनिक वैज्ञानिक और तकनीकी उपायों को अधिक प्राथमिकता दी जाए।
निर्देशों का पालन हुआ, फिर भी क्यों धधक रहे जंगल?
अदालत ने यह भी कहा कि वनाग्नि एक बार की नहीं, बल्कि हर साल सामने आने वाली पर्यावरणीय चुनौती है। इसलिए इसकी नियमित निगरानी और समय-समय पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नए निर्देश जारी करना जरूरी है।
यह जिम्मेदारी क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट बेहतर ढंग से निभा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव दत्ता से भी अनुरोध किया कि यदि उत्तराखंड हाईकोर्ट चाहे, तो वह एमिकस क्यूरी के रूप में, आवश्यकता पड़ने पर ऑनलाइन माध्यम सहित किसी भी उपयुक्त तरीके से अदालत की सहायता करें।
बता दें कि मई, 2026 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी अपने आदेश में उत्तराखंड में लगने वाली आग के मामले में देहरादून स्थित प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को अतिरिक्त जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।
वन विभाग से उसके कार्यबल की वास्तविक स्थिति पर विस्तृत जानकारी मांगी गई थी। इसके तहत विभाग में कार्यरत कुल अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या, जनगणना कार्य में लगाए गए कर्मियों का ब्यौरा, वन संरक्षण जैसे जरूरी कार्यों के लिए उपलब्ध कर्मचारियों की जानकारी देने को कहा गया था।
इसके अलावा, एनजीटी ने वनाग्नि जैसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए तैयार कंटीजेंसी प्लान और उसके तहत अधिकारियों व कर्मचारियों की तैनाती की रूपरेखा भी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि जंगलों में हर साल लगने वाली आग जैसी बदलती पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए केवल पुराने आदेश काफी नहीं हैं। समय के साथ बदलती परिस्थितियों, आधुनिक तकनीक और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप रणनीति बनाना और उसकी लगातार निगरानी करना ही प्रभावी समाधान की कुंजी है।
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