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भोजशाला मामला: शुक्रवार की नमाज पढ़ने के लिए परिसर के बाहर, अंदर नहीं, सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला मामले में अपना अंतरिम आदेश दिया है, जिसमें शुक्रवार की नमाज पढ़ने के लिए परिसर के बाहर एक अलग खुली जगह उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह व्यवस्था केवल अंतिम निर्णय आने तक लागू रहने को कहा है और कहा है कि इससे किसी भी पक्ष के दावों पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ेगा।

14 जुलाई 2026 को 05:14 pm बजे
भोजशाला मामला: शुक्रवार की नमाज पढ़ने के लिए परिसर के बाहर, अंदर नहीं, सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश

सौजन्य से:- Navbharat Times

Bhojshala Temple Dispute: भोजशाला को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति से छेड़छाड़ करने से मना कर दिया है। इसे बेहद संवेदनशील मामला बताते हुए हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों से धैर्य रखने को कहा।

नई दिल्ली: धार स्थित भोजशाला को लेकर वर्षों से चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति से छेड़छाड़ करने से मना कर दिया है। हालांकि संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए शुक्रवार की जुमे की नमाज के लिए परिसर के पास, अंदर नहीं.. अलग से खुली जगह उपलब्ध कराने का अंतरिम निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अंतिम निर्णय आने तक लागू रहेगी और इससे किसी भी पक्ष के दावों पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ेगा। साथ ही कोर्ट ने संकेत दिया कि वह मामले की नियमित सुनवाई कर जल्द फैसला करने के लिए तैयार है।

धार स्थित भोजशाला एक संरक्षित स्मारक है, जिसका संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और राजा भोज की विद्या स्थली बताता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है। लंबे समय से दोनों समुदाय धार्मिक अधिकारों को लेकर अलग-अलग दावे करते रहे हैं। सालों से चल रहे विवादित मामले में मई में इंदौर हाईकोर्ट की बेंच ने बड़ा फैसला दिया था...

भोजशाला को मंदिर माना: इंदौर बेंच ने अपने फैसले में कहा कि भोजशाला देवी वाग्देवी का मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र है। अदालत ने ASI के 2003 वाले आदेश को भी निरस्त कर दिया।

केंद्र सरकार और ASI को निर्देश : कोर्ट ने परिसर के प्रबंधन और प्रशासन को लेकर केंद्र सरकार और ASI को आगे की कार्रवाई करने को कहा है।

कोर्ट ने न सिर्फ इसे हिंदू मंदिर माना था, बल्कि कोर्ट ने लंदन से वाग्देवी की मूर्ति वापस लाने पर भी टिप्पणी की। हालांकि हाइकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को अलग मस्जिद के लिए जमीन देने का विकल्प खुला रखा था।

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मुस्लिम पक्ष

15 मई 2026 को आए हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ जब याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इस संवेदनशील मामले में हमें हमें ऐसा कोई आदेश नहीं देना चाहिए जिससे तनाव पैदा हो। उन्होंने कहा कि कोर्ट में कही गई बातें बेमतलब विवाद पैदा कर सकती हैं।

और भोजशाला को एक बेहद संवेदनशील मामला बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों से धैर्य रखने को कहा।

कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज अदा करने के लिए विवादित स्थल के पास ही एक अलग खुली जगह मुहैया कराई जाएगी। यह नमाज दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच पढ़ी जा सकेगी। यह व्यवस्था एड-हॉक है।

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा अहमदी और सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी की उस अंतरिम आदेश की मांग को ठुकरा दिया, जिसमें पुरानी स्थिति यानी status quo ante बहाल करने को कहा गया। जिसके तहत, मुसलमानों को तय दिनों पर हिंदू पूजा के साथ-साथ शुक्रवार को नमाज़ पढ़ने की इजाज़त थी।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि फिलहाल जो व्यवस्था चल रही है वही रहेगी और मामले को अगले 10 से 15 दिनों के भीतर उचित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि वह इस विवाद के स्थायी समाधान के लिए रोजाना सुनवाई करने को भी तैयार है।

ये बहुत संवेदनशील मामला है। अदालत में जो कहा जा रहा है, उससे बेवजह विवाद पैदा हो सकते हैं या गलत संदेश जा सकता है। हमें हर शब्द के इस्तेमाल को लेकर बहुत सावधान रहना होगा।

मामले की गंभीरता देखते हुए सुप्रीम कोर्ट बेंच की टिप्पणी

पूरे तथ्यों पर ध्यान देने से एक बात साफ होती है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विवाद का अंतिम समाधान शीघ्र सुनवाई के माध्यम से किया जाएगा। नमाज पढ़ने की जो अलग व्यवस्था की जा रही है वह तदर्थ यानी ad-hoc है। अदालत ने कहा कि यदि आवश्यकता हुई तो मामले की नियमित आधार पर सुनवाई की जाएगी। अंतिम निर्णय तक वर्तमान और नई अंतरिम व्यवस्थाएं लागू रहेंगी। और इस दौरान किसी भी पक्ष का दावे का अंतिम कानूनी निर्धारण नहीं माना जाएगा।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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