15 दस्तावेज के बावजूद नागरिकता साबित करना मुश्किल: हाईकोर्ट ने ठुकराया दावा
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक मामले में साफ किया है कि केवल PAN कार्ड, वोटर आईडी और अन्य सरकारी दस्तावेज भारतीय नागरिकता का स्वतः प्रमाण नहीं बन जाते। अदालत ने विदेशी न्यायाधिकरण के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें अमीनुल हक को विदेशी घोषित किया गया था।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Aminul Hoque Citizenship Claim Rejected Despite 15 Documents: हाईकोर्ट ने साफ किया है कि केवल PAN कार्ड, वोटर आईडी या अन्य सरकारी दस्तावेज किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का स्वतः प्रमाण नहीं बन जाते।
नई दिल्ली : क्या भारत में नागरिकता साबित करना मुश्किल हो गया है ? असम में नागरिकता से जुड़े एक अहम मामले में गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले से तो यही साबित होता है। हाईकोर्ट ने एक मामले में साफ किया है कि केवल PAN कार्ड, वोटर आईडी या अन्य सरकारी दस्तावेज किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का स्वतः प्रमाण नहीं बन जाते। अदालत ने विदेशी न्यायाधिकरण Foreigners Tribunal के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें अमीनुल हक को विदेशी घोषित किया गया था। याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में 15 दस्तावेज पेश किए थे, लेकिन अदालत ने उन्हें कानूनी कसौटी पर पर्याप्त नहीं माना।
नागरिकता साबित करने के लिए अमीनुल हक ने कौन-कौन से दस्तावेज पेश किए गए?
मामल में याचिकाकर्ता अमीनुल हक ने अदालत के समक्ष कुल 15 दस्तावेज प्रस्तुत किए। इनमें 1951 के एनआरसी का कंप्यूटर जनित रिकॉर्ड, विभिन्न वर्षों की मतदाता सूचियां, भूमि खरीद का दस्तावेज, स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड और वोटर आईडी कार्ड शामिल थे। उनका दावा था कि उनके पूर्वज 1971 की कट-ऑफ तिथि से पहले असम में रह रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि नामों की वर्तनी में अंतर केवल लिपिकीय त्रुटि है। परिवार के अलग-अलग गांवों में दर्ज होने का कारण ब्रह्मपुत्र नदी से भूमि कटाव बताया गया। हालांकि अदालत ने कहा कि इन दावों के समर्थन में स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य पर्याप्त रूप से प्रस्तुत नहीं किए गए। इसलिए दस्तावेजों की संख्या के बजाय उनकी प्रमाणिकता और आपसी कड़ी अधिक महत्वपूर्ण रही।
PAN कार्ड और वोटर आईडी अपने आप में भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। अदालत के अनुसार ये पहचान या कराधान और निर्वाचन संबंधी उद्देश्यों के लिए जारी दस्तावेज हैं, लेकिन नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते।
गुवाहाटी हाईकोर्ट
अदालत ने किन आधारों पर दस्तावेजों को पर्याप्त नहीं माना?
मामले में गुवाहाटी हाई कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत नागरिकता साबित करने का दायित्व संबंधित व्यक्ति पर होता है।
अदालत ने पाया कि कई दस्तावेज विधिक रूप से प्रमाणित नहीं थे या उन्हें साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी।
1951 के एनआरसी की कंप्यूटर कॉपी को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में विधिसम्मत तरीके से सिद्ध नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता के कथित रुप से पिता ने यह दावा किया कि अमीनुल हक मेरा बेटा है, लेकिन अदालत ने यह कहते हुए उनका दावा खारिज कर दिया कि केवल मौखिक बयान से दस्तावेजों में दर्ज व्यक्ति और याचिकाकर्ता के बीच संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।
अमीनुल हक रिकॉर्ड में उम्र, पते और पारिवारिक विवरणों में भी असंगतियां पाई गईं।
इन कारणों से अदालत ने विदेशी न्यायाधिकरण के निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
क्या PAN कार्ड और वोटर आईडी नागरिकता का प्रमाण हैं?
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही रहा कि अदालत ने दोहराया कि PAN कार्ड और EPIC वोटर आईडी अपने आप में भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं हैं। अदालत के अनुसार ये पहचान या कराधान और निर्वाचन संबंधी उद्देश्यों के लिए जारी दस्तावेज हैं, लेकिन नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते। यदि नागरिकता पर विवाद उत्पन्न होता है तो व्यक्ति को वैधानिक साक्ष्यों के माध्यम से अपनी नागरिकता साबित करनी होती है। अदालत ने इस मामले में दस्तावेजों की वैधता, प्रमाणिकता और पारिवारिक वंशावली की निरंतरता को अधिक महत्व दिया।
दस्तावेजी साक्ष्यों की गुणवत्ता और प्रमाणिकता पर अधिक जोर
दरअसल, अदालत ने इस मामले में फिर से यह कन्फ्यूजन दूर किया कि सिर्फ कागज हो जाने से नागरिकता सिद्ध नहीं होती। जैसा कि विदेशी अधिनियम के तहत कानूनी प्रावधानों में कहा गया है साक्ष्य का भार याचिकाकर्ता पर होता है और उसे विश्वसनीय दस्तावेजों के जरिए अपनी नागरिकता सिद्ध करनी होती है। ऐस में केवल बड़ी संख्या में दस्तावेज पेश कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रत्येक दस्तावेज का कानूनी रूप से स्वीकार्य होना भी आवश्यक है। विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और वंशानुगत संबंध स्थापित करने वाले दस्तावेजों के संबंध में अदालतें कड़ी कसौटी अपना ती आई हैं। उम्मीद है, इस मामले के बाद भविष्य में नागरिकता संबंधी मुकदमों में दस्तावेजी साक्ष्यों की गुणवत्ता और प्रमाणिकता पर अधिक जोर दिए जा सकेगा।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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