सुप्रीम कोर्ट ने अनुबंध कर्मचारियों को दिया बड़ा झटका, हिमाचल सरकार को फायदे का मौका
सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अनुबंध कर्मचारियों को उनके अनुबंध काल के लाभ मिलने का रास्ता साफ कर दिया है। हिमाचल सरकार को चार महीने का समय दिया गया है कि वह विवादित फैसले के अनुपालन में आवश्यक कार्रवाई करे।

सौजन्य से:- Jagran
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सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें अनुबंध कर्मचारियों को लाभ से वंचित करने वाले कानून को रद्द किया गया था। ...और पढ़ें
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को बरकरार रखा।
- अनुबंध कर्मचारियों को उनके अनुबंध काल के लाभ मिलेंगे।
- हिमाचल सरकार को फैसले के अनुपालन हेतु चार माह का समय।
जागरण संवाददाता, शिमला। सुप्रीम कोर्ट ने अनुबंध कर्मचारियों को उनके अनुबंध काल का लाभ न देने की मंशा से लाए कर्मचारी सेवा शर्तें अधिनियम को रद्द करने के हाईकोर्ट के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हाईकोर्ट के विवादित फैसले/ऑर्डर में दखल नहीं देना चाहते। इसलिए स्पेशल लीव पिटीशन खारिज की जाती है।
हिमाचल प्रदेश राज्य की ओर से पेश हुए एडवोकेट जनरल ने आग्रह किया कि सक्षम कोर्ट के दिए गए फैसले को मानने के लिए कुछ सही समय दिया जाए। सरकार के आग्रह को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को विवादित फैसले के हिसाब से ज़रूरी काम करने के लिए आज से चार महीने का समय दिया है।
उल्लेखनीय है कि कर्मचारियों के हक में हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया था। न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा बनाए गए विवादित कानून 'हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारी भर्ती और सेवा शर्तें अधिनियम, 2024' (अधिनियम संख्या 23 वर्ष 2025) को पूरी तरह से अवैध, असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने देविंदर कुमार एवं अन्य (मुख्य याचिका संख्या सीडब्लयूपी नंबर. 3361 of 2025) सहित 260 से अधिक संबंधित याचिकाओं पर संयुक्त रूप से सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक निर्णय दिया था। हाईकोर्ट ने सरकार के इस कदम को अदालती फैसलों को पलटने का एक अनुचित प्रयास मानते हुए कहा था कि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में अनुबंध, तदर्थ और अस्थाई रूप से नियुक्त हजारों कर्मचारियों को लेकर लंबे समय से कानूनी लड़ाई चल रही थी। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय ने पूर्व के कई ऐतिहासिक फैसलों (जैसे शीला देवी मामला, ताज मोहम्मद मामला, लेख राम मामला आदि) में यह स्पष्ट रूप से तय कर दिया था कि यदि संविदा कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया नियमित भर्ती के समान ही पारदर्शी और नियमों के तहत हुई है, तो उनकी संविदा सेवा अवधि को वरिष्ठता, पेंशन और अन्य सेवा लाभों के लिए गिना जाना चाहिए।
अदालत के इन आदेशों के कारण वित्तीय और प्रशासनिक दबाव से बचने के लिए, राज्य सरकार ने विधानसभा से एक नया अधिनियम (सरकारी कर्मचारी सेवा अधिनियम, 2024) पारित करवाया, जिसे 7 फरवरी 2025 को राज्यपाल की स्वीकृति मिली। सरकार ने इस कानून को बैकडेट प्रभाव से लागू किया।
इसके तहत अनुबंध, अस्थाई और तदर्थ नियुक्तियों को 'सार्वजनिक सेवाओं' के दायरे से ही बाहर कर दिया गया। इसके जरिए कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए कर्मचारियों के हक के फैसलों को विधायी तरीके से निष्प्रभावी करने का प्रयास किया गया। प्रशासनिक स्तर पर आदेश जारी कर कर्मचारियों को अदालती फैसलों के तहत मिल चुके या मिलने वाले लाभों को वापस लेने या रोकने की तैयारी कर ली गई थी। इसके विरोध में देविंदर कुमार सहित सैकड़ों कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कर इस कानून की वैधता को चुनौती दी थी।
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