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हाईकोर्ट ने कहा: ज़मीनी म्यूटेशन के ऑनलाइन आवेदन में कोई कानूनी बाधा नहीं

जम्मुंदपुर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व अधिकारी आवेदक को म्यूटेशन हेतु ऑनलाइन फॉर्म जमा करने के लिए कह सकते हैं और यह 1973 के रिकॉर्ड‑रखरखाव एक्ट की धारा 11 का उल्लंघन नहीं है। डिजिटल प्रक्रिया से पारदर्शिता बढ़ती है, फाइलों में देरी और हेरफेर की संभावना घटती है, तथा डिजिटल सुविधाओं से वंचित ग्रामीण लोगों को पंचायत या ई‑सेवा केंद्रों की सहायता से आवेदन करने की सुविधा दी गई है।

10 सितंबर 2026 को 01:04 pm बजे
हाईकोर्ट ने कहा: ज़मीनी म्यूटेशन के ऑनलाइन आवेदन में कोई कानूनी बाधा नहीं

सौजन्य से:- Hindustan

ऑनलाइन दाखिल-खारिज कानून का उल्लंघन नहीं : हाईकोर्ट

कानून में नहीं होने के बावजूद डिजिटल व्यवस्था को नकारा नहीं जा सकता, पारदर्शिता बढ़ेगी, देरी और भौतिक रिकॉर्ड में हेरफेर की संभावना होगी कम, डिजिटल सु

रांची। विशेष संवाददाता झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन के म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राजस्व अधिकारी आवेदक से म्यूटेशन के लिए ऑनलाइन आवेदन जमा करने को कह सकते हैं, यह बिहार टेनेंट्स होल्डिंग्स (मेंटेनेंस ऑफ रिकॉर्ड्स) एक्ट, 1973 की धारा 11 का उल्लंघन नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून में ऑनलाइन आवेदन का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने के बावजूद वर्तमान डिजिटल व्यवस्था में आवेदन की प्रक्रिया को केवल ऑफलाइन आवेदन तक सीमित नहीं किया जा सकता। जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने जमशेदपुर निवासी मदन मोहन प्रसाद की ओर से दाखिल याचिका पर यह आदेश सुनाया।

म्यूटेशन के लिए आवेदन

प्रार्थी ने मानगो के वार्ड नंबर 10 स्थित खाता नंबर 427, प्लॉट नंबर 2160 और 0.02.40 हेक्टेयर जमीन का म्यूटेशन अपने नाम करने की मांग की थी। सर्किल ऑफिसर ने ऑफलाइन आवेदन लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि म्यूटेशन के लिए ऑनलाइन आवेदन करना जरूरी है।

ऑनलाइन प्रक्रिया का लाभ

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि एक्ट की धारा 11 में निर्धारित प्रपत्र में आवेदन देने का प्रावधान है, लेकिन इसमें ऑनलाइन आवेदन को अनिवार्य नहीं किया गया है। वहीं, राज्य सरकार ने ऑनलाइन व्यवस्था का बचाव करते हुए कहा कि इससे पारदर्शिता बढ़ती है। साथ ही फर्जी रसीद जारी करने पर रोक लगती है और म्यूटेशन की प्रक्रिया की निगरानी भी बेहतर तरीके से की जा सकती है।

डिजिटल व्यवस्था से देरी और हेरफेर की संभावना कम

हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 1973 में जब संबंधित कानून बनाया गया था, उस समय डिजिटल व्यवस्था की कल्पना नहीं की गई थी। वर्तमान समय में जमीन के रिकॉर्ड का डिजिटाइजेशन और ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था प्रशासनिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाती है। इससे फाइलों की आवाजाही में होने वाली देरी और भौतिक रिकॉर्ड में हेरफेर की संभावना भी कम होती है।

डिजिटल सुविधा से वंचित लोगों का भी रखा ध्यान

अदालत ने डिजिटल सुविधा से वंचित लोगों की परेशानी को भी गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में सभी लोगों को डिजिटल सुविधाएं समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे लोग पंचायतों के सुविधा केंद्र, प्रज्ञा केंद्र, मोबाइल ई-सेवा केंद्र या विधिक सेवा प्राधिकरण के पैरा लीगल वॉलंटियर की सहायता से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

ऑनलाइन म्यूटेशन आवेदन दाखिल करने का निर्देश

अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए मदन मोहन प्रसाद को तत्काल ऑनलाइन म्यूटेशन आवेदन दाखिल करने का निर्देश दिया। किसी तरह की परेशानी होने पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से सहायता लेने को कहा गया। कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि ऑनलाइन आवेदन मिलने के बाद नियमानुसार उस पर निर्णय लेकर आवेदक को इसकी जानकारी दी जाए।

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