सुप्रीम कोर्ट ने कहा हाई‑पॉवर्ड इनक्वायरी कमेटी को FIR दर्ज करने का अधिकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंसा के आरोपों की जांच कर रही एचपीईसी को FIR दायर करने का आदेश केवल अदालत ही दे सकती है, समिति स्वयं नहीं कर सकती। कोर्ट ने समिति के काम पर सीधी निगरानी, सुझाव‑आपत्ति स्वीकार करने और संवेदनशील गवाहों के लिए हेल्पलाइन जैसी सुविधाएँ प्रदान करने की अनुमति दी, तथा उसके पुनर्गठन के प्रस्ताव को खारिज किया। समिति की पहली बैठक 15 सितंबर को निर्धारित है।

सौजन्य से:- thewirehindi.com
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10 सितंबर) को कहा कि युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के आरोपों की जांच कर रही हाई-पावर्ड इंक्वायरी कमेटी (एचपीईसी) एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक जांच का निर्देश देने का अधिकार केवल अदालत के पास है.
यह स्पष्टीकरण उस समय आया जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने गुरुवार को एचपीईसी की कार्यवाही में तेजी लाने पर सहमति जताई. शीर्ष अदालत ने कहा कि समिति के कामकाज के दौरान सामने आने वाली किसी भी खामी को वह ‘दूर कर देगी.’
पीठ ने कहा, ‘समिति को इस अदालत की सीधी निगरानी में काम करना होगा.’ अदालत ने यह भी कहा कि समिति सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ख़ुद को प्रस्तुत करने के लिए खुद किसी एमिकस क्यूरी या वकील की नियुक्ति कर सकती है.
पीठ ने समिति को अपनी कार्यवाही का व्यापक प्रचार करने, सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित करने तथा एक समर्पित व्यवस्था बनाने की भी अनुमति दी. इसमें उन संवेदनशील गवाहों के लिए हेल्पलाइन भी शामिल हो सकती है, जो सीधे समिति के सामने आने में सक्षम नहीं हैं.
केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि समिति की पहली बैठक 15 सितंबर को प्रस्तावित है.
इसके साथ शीर्ष अदालत ने गुरुवार को समिति के गठन में बदलाव करने के सुझावों को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि उसने खुद इस समिति का गठन किया है और उसके काम शुरू करने से पहले ही इसका पुनर्गठन नहीं किया जाएगा.
पीठ ने कहा, ‘हम इस तरह किसी समिति का पुनर्गठन नहीं कर सकते.’
अदालत ने कहा कि एचपीईसी के कामकाज को लेकर किसी भी तरह की चिंता उसके सामने उठाई जा सकती है.
20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में एचपीईसी का गठन किया था. समिति को 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान हिंसा के आरोपों की जांच करनी है.
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस शालिंदर कौर, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व डीजीपी एलआर बिश्नोई एचपीईसी के अन्य सदस्य हैं.
गौरतलब है कि समिति में नागरिक समाज का कोई प्रतिनिधि नहीं है. अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस समिति को ‘बहुत कमजोर’ बताया था.
20 जुलाई को सीजेपी द्वारा बुलाए गए संसद चलो मार्च के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया था. पुलिस ने पैलेट गन भी चलाई थी. उस समय बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी संसद से कुछ ही मीटर की दूरी पर जमा हुए थे और प्रदर्शन काफी हद तक शांतिपूर्ण था.
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