कर्नाटक हाईकोर्ट की ED को फटकार: कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करें
कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में कानून की मर्यादा का ख्याल रखने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने ED की तलाशी और जब्ती कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए, एजेंसी को अगली सुनवाई तक स्थिति यथावत रखने का निर्देश दिया है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
प्रवर्तन निदेशालय ED को कर्नाटक हाईकोर्ट से उस समय कड़ी फटकार का सामना करना पड़ा जब अदालत ने एक आबकारी विभाग के अतिरिक्त आयुक्त और उनके परिवार के खिलाफ की गई तलाशी कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए।
नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय यानी ED पर सरकार के हाथों का खिलौना या अपनी मनमर्जी करने के आरोप नए नहीं हैं। ताजा मामले में प्रवर्तन निदेशालय ED को कर्नाटक हाईकोर्ट से उस समय कड़ी फटकार का सामना करना पड़ा जब अदालत ने एक आबकारी विभाग के अतिरिक्त आयुक्त और उनके परिवार के खिलाफ की गई तलाशी कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई आवश्यक है, लेकिन किसी भी जांच एजेंसी को कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्रवाई करनी होगी। आप कानून की मर्यादा का ख्याल रखें..
मामला आबकारी विभाग के अतिरिक्त आयुक्त डॉ. वाई. मंजूनाथ और उनकी पत्नी द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा है। याचिकाओं में जून में ED द्वारा बेलगावी और बेंगलुरु स्थित परिसरों पर की गई तलाशी को चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ED की कार्रवाई कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस द्वारा दर्ज एक रंगे हाथों पकड़े जाने के मामले से जुड़ी थी। बाद में इस केस को जगदीश नायक नाम के आबकारी अधिकारी के खिलाफ दर्ज किया गया था, जिसे कथित तौर पर ₹25 लाख की रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया था। याचिकाकर्ताओं ने फिर अदालत को बताया कि न तो एडिशनल कमिश्नर और न ही उनके परिवार के सदस्यों का नायक या मुख्य अपराध से कोई संबंध था।
कर्नाटक हाईकोर्ट में कोर्ट, जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने आबकारी विभाग के एडिशनल कमिश्नर डॉ. वाई. मंजूनाथ और उनकी पत्नी महादेवी मंजूनाथ की याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनके जरिए 24 और 25 जून को बेलागावी और बेंगलुरु में उनके घरों पर PMLA की धारा 17 के तहत ED द्वारा की गई तलाशी और ज़ब्ती की कार्रवाई को चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यदि मामला आय से अधिक संपत्ति यानी धारा 13 से जुड़ा होता तो ED की दलीलों पर अलग दृष्टिकोण अपनाया जा सकता था। लेकिन वर्तमान मामला कथित रूप से धारा 7A के ट्रैप केस से संबंधित है।
अदालत ने पूछा कि जिस आरोपी के विरुद्ध ट्रैप केस दर्ज हुआ, उसका अतिरिक्त आयुक्त या उनके परिवार से क्या संबंध है। कोर्ट ने संकेत दिया कि जांच एजेंसी को ऐसे मामलों में पर्याप्त प्रारंभिक सामग्री प्रस्तुत करनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत का मुख्य प्रश्न यह था कि जिन लोगों के यहां तलाशी ली गई, उनका मूल अपराध मतलब, Predicate Offence से क्या कुछ संबंध है? यदि किसी व्यक्ति का नाम मूल अपराध में नहीं है तो उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए कम से कम मनी ट्रेल या घटनाओं की ऐसी श्रृंखला होनी चाहिए जिससे उसका संबंध स्थापित हो सके।
फिर कोर्ट ने माना कि एजेंसी की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाना सराहनीय है, लेकिन एजेंसी को कानून के अनुरूप कार्य करना होगा। इसलिए अगली सुनवाई तक ED को कोई कठोर कदम नहीं उठाने का निर्देश दिया गया।
हो सकता है कि आप (ED) भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले हों, लेकिन यह सब कानून के मुताबिक होना चाहिए। अगर आप सच में किसी विभाग से भ्रष्टाचार खत्म करना चाहते हैं, तो कानून के दायरे में रहकर ऐसा करें। आपको कोर्ट में आकर ऐसी कार्रवाई का बचाव करने की ज़रूरत नहीं है जिसका पहली नज़र में कोई बचाव न हो सके
दरअसल यह मामला इसलिए भी खास है क्योंकि यह प्रवर्तन निदेशालय के PMLA के तहत तलाशी और जब्ती की शक्तियों के प्रयोग की न्यायिक समीक्षा का उदाहरण बन सकता है। जिस तरह से आए दिन प्रवर्तन निदेशालय ED पर तमाम विपक्षी दलों और पीड़ित आरोप लगाते आए हैं..उम्मीद है कि अगली सुनवाई में अदालत भविष्य में जांच एजेंसियों के लिए प्रक्रिया संबंधी मानकों को और साफ कर सकता है। अदालत ने फिलहाल ED को अगली सुनवाई तक स्थिति यथावत रखने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को निर्धारित की गई है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
कन्वर्सेशन शुरू करें
Legalकी ताजा खबरें, ब्रेकिंग न्यूज, अनकही और सच्ची कहानियां, सिर्फ खबरें नहीं उसका विश्लेषण भी। इन सब की जानकारी, सबसे पहले और सबसे सटीक हिंदी में देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे भरोसेमंद Hindi Newsडिजिटल प्लेटफ़ॉर्म नवभारत टाइम्स पर
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
आठ साल बाद कानून ने पकड़ा दो एनडीपीएस वारंटियों को

न्याय में देरी : सुप्रीम कोर्ट की अपेक्षा

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य निगरानी का आदेश दिया

क्या सलवार उतारना और छाती दबाना रेप नहीं है? जानें कानून में बलात्कार की परिभाषा

सुप्रीम कोर्ट ने सजग रूप से स्पष्ट किया: मजिस्ट्रेट पुलिस को आरोपपत्र दाखिल करने का निर्देश नहीं दे सकता

न्यायपालिका को यौन अपराधों पर संवेदनशील बनाने की आवश्यकता

दिल्ली हाई कोर्ट ने सोनम वांगचुक को जान बचाने के लिए आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर जताई चिंता, सुनवाई जारी
ताज़ा ख़बरें
- भारतीय सर्वोच्च न्यायालय का दुर्लक्षित निर्णय न्यायिक भ्रष्टाचार को शिक्षकों से प्रतिबंधित कर रहा है
- पी एंड एच उच्च न्यायालय का साप्ताहिक राउंड-अप: हत्या के आरोप के बाद एसआईटी जांच की मांग और सजा में संशोधन का मामला
- सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत कार्रवाई के लिए दी निंदा, मद्रास हाई कोर्ट की अंतरिम रोक बरकरार
- 47 वर्षों के बाद भी दोषी नाबालिग से गैंगरेप, कोर्ट ने कम की सजा
- पाकिस्तानी लड़की समन अब्बास हत्याकांड: इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने अदालत के फैसले का स्वागत किया
- सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने खोली यौन उत्पीड़न पीड़िताओं की दर्दनाक सच्चाई, संवेदनशीलता की कमी, विक्टिम ब्लेमिंग का शिकार
- फर्जी वीजा रैकेट मामले में जमानत मिलती है, अदालत ने कहा- सिर्फ जांच लंबित है
- बुलडोजर जस्टिस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, अवमानना याचिकाओं को हाईकोर्ट को सौंपा

