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सुप्रीम कोर्ट में वकील की पोशाक में जज पर पेपर उछालने वाले प्रबल प्रताप की दिलचस्प कहानी

सुप्रीम कोर्ट में वकील की पोशाक में जज पर पेपर उछालने वाले प्रबल प्रताप की कहानी एकतरफा सनक, ऑफिस की रंजिश और मनगढ़ंत आरोपों से जुड़ी हुई है. वह एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता था, लेकिन अपनी सहकर्मी को परेशान करने के कारण नौकरी से निकाले जाने के बाद उसने कंपनी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और बदला लेने की नीयत से कानूनी दांवपेंच आजमाने शुरू कर दिए.

11 जुलाई 2026 को 08:57 am बजे
सुप्रीम कोर्ट में वकील की पोशाक में जज पर पेपर उछालने वाले प्रबल प्रताप की दिलचस्प कहानी

सौजन्य से:- AajTak

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देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट के भीतर उस वक्त हड़कंप मच गया, जब वकील की पोशाक में पहुंचे एक याचिकाकर्ता ने न सिर्फ जजों के साथ बदसलूकी की, बल्कि कोर्ट रूम में फाइल के पन्ने हवा में उछाल दिए. सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने खड़े होकर जजों को 'ऑर्डर' देने वाले और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करने वाले इस शख्स की पहचान प्रबल प्रताप यादव के रूप में हुई है.

प्रबल प्रताप उत्तर प्रदेश के इटावा (भरथना) का रहने वाला है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के भीतर इस दुस्साहस और हाई-वोल्टेज ड्रामे के पीछे की जो कहानी सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली है. यह पूरी कहानी एकतरफा सनक, ऑफिस की रंजिश और फिर 'देश विरोधी' होने के मनगढ़ंत आरोपों के ताने-बाने से जुड़ी है.

सुप्रीम कोर्ट के भीतर आखिर क्या हुआ था?

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी. कोर्ट रूम में मौजूद चश्मदीदों और अदालती आदेश के मुताबिक, एडवोकेट की ड्रेस पहनकर आए प्रबल प्रताप ने बेंच को 'मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट' कहकर संबोधित किया. इतना ही नहीं, उसने जजों पर रौब झाड़ते हुए कहा, 'मैं आपको आदेश देता हूं कि लखनऊ के एसीपी (विकासनगर) के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी करें.'

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इस पर हैरान होकर जब जस्टिस विश्वनाथन ने पूछा कि क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं? तो प्रबल प्रताप ने खुद को संप्रभु बताते हुए कहा कि मेरी तरफ से बस इतना ही, सब कुछ रिकॉर्ड पर है. इसके तुरंत बाद उसने अपने हाथ में मौजूद 185 पन्नों की फाइल को हवा में उछाल दिया और जजों पर पेपर फेंकते हुए सीजेआई के लिए असंसदीय व अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया. माहौल बिगड़ता देख वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत उसे पकड़कर कोर्ट रूम से बाहर निकाला. हालांकि, कोर्ट ने उसकी इस हरकत को गंभीर अवमानना मानते हुए भी, उसकी मानसिक स्थिति को देखते हुए कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की और उसे माफ कर दिया. लेकिन उसकी याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया.

लड़की को परेशान किया, कंपनी ने निकाला तो बन गया 'देशभक्त'!

जांच में सामने आया कि प्रबल प्रताप यादव लखनऊ के विकासनगर स्थित एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी में काम करता था. वहां काम करने के दौरान वह अपने साथ काम करने वाली एक मुस्लिम सहकर्मी (महिला कर्मचारी) को लगातार परेशान कर रहा था और उसे आपत्तिजनक व एब्यूजिव ईमेल भेज रहा था. कंपनी ने उसकी इस हरकत पर पहले उसे कड़ी चेतावनी दी, लेकिन जब वह नहीं सुधरा, तो कंपनी ने उसे नौकरी से टर्मिनेट (बरखास्त) कर दिया.

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नौकरी से निकाले जाने के बाद प्रबल प्रताप ने बदला लेने की नीयत से कंपनी के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया. उसने कंपनी पर 'देश विरोधी गतिविधियों' में शामिल होने का मनगढ़ंत आरोप लगाया और एफआईआर की मांग को लेकर कानूनी दांवपेंच आजमाने शुरू कर दिए.

लखनऊ से दिल्ली तक कानूनी ड्रामे की क्रोनोलॉजी

नवंबर 2025: प्रबल प्रताप ने लखनऊ की सीजेएम (CJM) कोर्ट में कंपनी के खिलाफ देश विरोधी काम करने की एफआईआर दर्ज कराने के लिए अर्जी डाली. कोर्ट ने पुलिस से इस पर रिपोर्ट मांगी.

26 फरवरी 2026: पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर जब कोर्ट ने प्रबल से सबूत मांगे, तो कोर्ट ने मामले को पुलिस एफआईआर के बजाय सीधे 'कम्प्लेंट केस' (निजी शिकायत) के रूप में दर्ज कर लिया.

6 अप्रैल 2026: इस मामले में उसे कोर्ट में सबूत पेश करने थे, लेकिन पुलिस से एफआईआर न कराने की जिद पर अड़े प्रबल ने इसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में अपील दायर कर दी कि कम्प्लेंट केस रद्द कर सीधे एफआईआर का आदेश दिया जाए.

हाई कोर्ट का झटका: हाई कोर्ट ने उसकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जब निचली अदालत मामले की सुनवाई कर रही है, तो कानून के मुताबिक वहीं तथ्य रखे जाएं.

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हाई कोर्ट से अपनी याचिका खारिज होने के बाद तिलमिलाया प्रबल प्रताप सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जहां उसने अपनी सनक में देश की सबसे बड़ी अदालत की मर्यादा को भी तार-तार करने की कोशिश की.

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