पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामले में केंद्रीय मंत्री के बेटे को जमानत, कानूनी विशेषज्ञों के बीच बहस
तेलंगाना हाई कोर्ट ने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार के बेटे बंदी साई भागीरथ को पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामले में नियमित जमानत दे दी है. जस्टिस के. सुजाना ने गुरुवार को दिए गए अपने आदेश में भागीरथ को जमानत देने से नाबालिग पीड़िता की सुरक्षा और आरोपी की व्यक्तिगत आजादी के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की. हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस पर बहस छिड़ गई है तो जमानत देना सही था या नहीं, इसके पीछे के कारणों पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

सौजन्य से:- ThePrint Hindi
नई दिल्ली: केंद्रीय गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार के बेटे बंदी साई भागीरथ को पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दर्ज मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट से जमानत मिलने के फैसले ने कानूनी विशेषज्ञों के बीच बहस छेड़ दी है. कुछ विशेषज्ञ इसे बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में अदालतों के आम तौर पर अपनाए जाने वाले सतर्क रुख से अलग बता रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि अदालत ने आरोपी की व्यक्तिगत आजादी के अधिकार और पीड़िता की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है.
गुरुवार को दिए गए अपने आदेश में जस्टिस के. सुजाना ने भागीरथ को नियमित जमानत दे दी. वह मई से न्यायिक हिरासत में था. हाई कोर्ट ने कहा कि जांच “लगभग पूरी हो चुकी है” और अब सिर्फ चार्जशीट दाखिल होना बाकी है. अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता की गवाहों को डराने या जांच में दखल देने की आशंकाओं को आरोपी को जेल में रखने के बजाय कड़ी जमानत शर्तों के जरिए दूर किया जा सकता है.
8 मई को पीड़िता की मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि भागीरथ के दोस्तों ने सोशल मीडिया पर उनकी 17 साल की नाबालिग बेटी से दोस्ती की. इसके बाद, उनके अनुसार, भागीरथ ने शादी का वादा कर उससे संबंध बनाया और अलग-अलग मौकों पर उसके साथ कई बार यौन शोषण किया.
अदालती आदेश के मुताबिक, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी बेटी को शराब पिलाई गई और उसकी निजी तस्वीरें “सोशल सर्कल” में फैलाई गईं.
अदालत में भागीरथ के वकीलों ने कहा कि वह निर्दोष है और उसे झूठा फंसाया गया है. उन्होंने अदालत को बताया कि वह 16 मई से न्यायिक हिरासत में है और जांच के दौरान उसने पुलिस का पूरा सहयोग किया है.
वकीलों ने यह भी कहा कि पीड़िता और दूसरे अहम गवाहों से पुलिस पहले ही पूछताछ कर चुकी है, लेकिन अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है. उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि 22 से 24 जून के बीच भागीरथ को अपनी BBA की परीक्षा देने के लिए अंतरिम जमानत मिली थी और उस दौरान उसके खिलाफ जमानत का गलत इस्तेमाल करने का कोई आरोप नहीं लगा.
जमानत की शर्तों के तहत भागीरथ को पीड़िता, शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष के गवाहों से संपर्क करने, उनके आने-जाने वाली जगहों पर जाने, मामले को लेकर सार्वजनिक बयान देने या सोशल मीडिया पर पीड़िता या मुकदमे से जुड़ी कोई भी सामग्री पोस्ट करने से रोक दिया गया है. मुकदमा पूरा होने तक उसे इंटरव्यू देने, पॉडकास्ट करने या मीडिया से बात करने की भी अनुमति नहीं होगी.
एक शर्त में यह भी कहा गया है कि भागीरथ को हर सोमवार पुलिस के सामने हाजिर होना होगा. यह व्यवस्था आठ हफ्तों तक या चार्जशीट दाखिल होने तक, जो भी पहले हो, लागू रहेगी ताकि जांच में सहयोग मिल सके.
वकीलों के बीच बहस
जहां हाई कोर्ट ने इन शर्तों को पर्याप्त माना, वहीं दिप्रिंट से बात करने वाले कई वकीलों ने इस पर सवाल उठाया कि क्या ऐसी शर्तें केंद्रीय मंत्री के बेटे के खिलाफ नाबालिग से जुड़े मामले में शिकायतकर्ता की पर्याप्त सुरक्षा कर सकती हैं.
दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करने वाली अधिवक्ता सौम्या दुबे ने कहा कि अदालत के आदेश में दोनों पक्षों के बीच ताकत के असंतुलन को कम करके आंका गया है. उन्होंने कहा, “जमानत देते समय हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच मौजूद ताकत के बड़े अंतर को नजरअंदाज किया है. आरोपी एक केंद्रीय मंत्री का बेटा है. ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति को इतने गंभीर मामले में रिहा करना तुरंत खतरा पैदा करता है. इससे न सिर्फ चल रही जांच की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है क्योंकि गवाहों को प्रभावित करने का रास्ता खुल जाता है, बल्कि एक युवा और कमजोर पीड़िता को डराने का भी गंभीर खतरा रहता है.”
अदालत में भागीरथ की जमानत का विरोध करते हुए शिकायतकर्ता के वकीलों ने कहा था कि जांच अभी पूरी नहीं हुई है और पीड़िता द्वारा बताए गए कई अहम गवाहों से अभी पूछताछ बाकी है.
राज्य सरकार ने हाई कोर्ट को बताया कि चार्जशीट दाखिल करने को छोड़कर जांच लगभग पूरी हो चुकी है. उसने पीड़िता का बयान और फॉरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी. हालांकि उसने यह कहते हुए जमानत का विरोध किया कि आरोप बेहद गंभीर हैं और मामला एक नाबालिग से जुड़ा है.
दिल्ली के वकील आयुष तंवर ने कहा कि हाई कोर्ट का यह फैसला इसलिए अलग माना जा रहा है क्योंकि आम तौर पर पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों में अदालतें इतने शुरुआती चरण में नियमित जमानत देने से बचती हैं.
उन्होंने कहा, “इस मामले में लगे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अदालतें आमतौर पर शुरुआती दौर में जमानत देने से हिचकिचाती हैं. लेकिन जांच औपचारिक रूप से पूरी होने से पहले ही आरोपी को जमानत देकर हाई कोर्ट ने सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से अलग रास्ता अपनाया है. इस मामले में अदालत का फैसला अपवाद है, सामान्य नियम नहीं.”
हाई कोर्ट ने कहा कि अगर उसे यह भरोसा हो जाए कि आरोपी फरार नहीं होगा, गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा या न्याय में बाधा नहीं डालेगा और इन आशंकाओं को कड़ी शर्तों से दूर किया जा सकता है, तो फिर उसे जेल में रखना आम तौर पर जरूरी नहीं होगा.
दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करने वाली अधिवक्ता पल्लवी गर्ग के मुताबिक अदालत का यह तर्क संवैधानिक संतुलन बनाने की कोशिश दिखाता है.
उन्होंने कहा, “तेलंगाना हाई कोर्ट ने जमानत देने में आम तौर पर जिन बातों पर ध्यान दिया जाता है, जैसे आरोपी द्वारा पीड़िता या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका, उन्हें ध्यान में रखा है. अदालत ने इन जोखिमों को कम करने के लिए बहुत सख्त जमानत शर्तें लगाई हैं. अदालत का तर्क आरोपी की व्यक्तिगत आजादी के मौलिक अधिकार और निष्पक्ष जांच व पीड़िता के हितों की रक्षा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दिखाता है.”
हालांकि गर्ग ने कहा कि यह आदेश एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है कि पॉक्सो जैसे विशेष कानूनों के तहत अदालतों को जमानत के मामलों को किस तरह देखना चाहिए.
उन्होंने कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) के विपरीत, पॉक्सो एक्ट एक कल्याणकारी कानून है जिसे खास तौर पर बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया है और अदालतें इसकी व्याख्या हमेशा पीड़ित-केंद्रित नजरिए से करती रही हैं.
उन्होंने कहा, “व्यवहार में अदालतें गंभीर पॉक्सो मामलों में पीड़िता का अदालत में बयान दर्ज होने से पहले नियमित जमानत देने में काफी सावधानी बरतती हैं ताकि डराने, लालच देने या मुकदमे को प्रभावित करने की कोई संभावना न रहे. इस नजरिए से देखा जाए तो यह आदेश बच्चों से जुड़े मामलों में आम तौर पर अपनाए जाने वाले सतर्क रुख से अलग है.”
उन्होंने कहा कि हालांकि हाई कोर्ट ने आरोपी पर कई सख्त पाबंदियां लगाई हैं, फिर भी जब मामला किसी प्रभावशाली परिवार से जुड़ा हो तो यह सवाल बना रहता है कि क्या ये शर्तें पर्याप्त हैं. “इसलिए यह फैसला विशेष कानूनों के तहत जमानत से जुड़ी न्यायिक सोच पर चर्चा को आगे बढ़ाएगा, जहां व्यक्तिगत आजादी और पीड़ित की सुरक्षा जैसे दोनों हितों के बीच बेहद सावधानी से संतुलन बनाना होता है.”
पॉक्सो मामलों की विशेषज्ञ वकील सीमा मिश्रा ने इस आदेश की और भी कड़ी आलोचना की और इसे असाधारण बताया.
उन्होंने कहा, “पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप झेल रहे एक वयस्क आरोपी का सिर्फ 55 दिन हिरासत में रहने के बाद जमानत मिलना लगभग कभी नहीं देखा गया. आम तौर पर जमानत पर विचार तभी किया जाता है जब मुकदमे के दौरान पीड़िता का बयान अदालत में दर्ज हो जाए. कानून में नाबालिग की सहमति का कोई महत्व नहीं है. यह सामान्य प्रक्रिया नहीं है. यह एक असाधारण और दुर्भाग्यपूर्ण आदेश है.”
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि हाल के दिनों में अदालतों में ऐसे मामलों में, जहां पीड़ित की उम्र बालिग होने के करीब हो, कथित सहमति वाले संबंधों को महत्व देने की प्रवृत्ति बढ़ती दिख रही है. जबकि पॉक्सो कानून के तहत बच्चे की सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है.
मई में गिरफ्तारी से पहले भागीरथ ने हाई कोर्ट में गिरफ्तारी से सुरक्षा की मांग की थी. उसने कहा था कि संबंध आपसी सहमति से थे और पॉक्सो एक्ट लागू नहीं होना चाहिए. हाई कोर्ट ने उसे अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था. बाद में उसने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया. पिछले महीने उसे BBA की सप्लीमेंट्री परीक्षा देने के लिए अंतरिम जमानत मिली थी. नियमित जमानत की मांग करते समय उसके वकीलों ने इसी बात का भी हवाला दिया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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