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सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों को कानूनी कवच देने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर्स को कानूनी कवच देने का आदेश दिया है, जिसमें शादीशुदा महिलाओं की तरह ही उन्हें विवाह की प्रकृति वाले रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को सुरक्षा देने का प्रावधान है. कोर्ट ने इस फैसले के साथ यह भी कहा कि पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता को दंडित करने वाली धारा 498A का दायरा बढ़ाया गया है

4 अगस्त 2026 को 04:15 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालों को कानूनी कवच देने का आदेश दिया

सौजन्य से:- ETV Bharat

लिव-इन रिलेशनशिप में क्रूरता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, शादीशुदा महिलाओं की तरह मिलेगा कानूनी कवच

कोर्ट ने क्रूरता से जुड़ी धारा का दायरा बढ़ाते हुए लिव-इन पार्टनर्स पर भी लागू करने का आदेश दिया और समलैंगिक संबंधों का उदाहरण दिया.

By Sumit Saxena

Published : August 3, 2026 at 9:46 PM IST

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम टिप्पणी की कि जिस तरह समलैंगिक संबंधों को- जो कभी अपराध और कलंक माने जाते थे- अब अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है और प्राकृतिक माना गया है. उसी तरह शादी से पहले साथ रहना (लिव-इन रिलेशनशिप) अब असामान्य या अस्वीकार्य नहीं रह गया है. पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की जाने वाली क्रूरता को दंडित करने वाली धारा का दायरा बढ़ाते हुए शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि यह प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर्स पर भी लागू होगा.

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि पहले के दिनों में विवाह को ही एकमात्र ऐसा तरीका माना जाता था जिससे दो व्यक्ति जीवन भर साथ रह सकते थे, और इसके बिना ऐसा करने को एक सामाजिक कलंक माना जाता था.

अदालत ने कहा कि विवाह को पवित्र माना जाता था; जो निस्संदेह अब एक बदलती हुई व्यवस्था है. अपने 77 पन्नों के फैसले में पीठ ने कहा, "शादी से पहले साथ रहना अब अनसुना या अस्वीकार्य नहीं रह गया है. ठीक उसी तरह, जैसे समलैंगिक संबंध, जिन्हें कभी अपराध और मानसिक बीमारी माना जाता था, अब अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिए गए हैं और उन्हें प्राकृतिक माना गया है."

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि यह सामाजिक मानकों का क्रमिक विकास है. कोर्ट ने अमेरिकी न्यायाधीश ओलिवर वेंडेल होम्स के शब्दों का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून 'एक छोर पर जीवन से नए सिद्धांतों को अपनाने' और दूसरे छोर पर पुराने सिद्धांतों को 'छोड़ देने' जैसा है।

पीठ ने कहा कि वे रिश्ते जो विवाह की प्रकृति के हैं और जिनमें शादी करने का जरूरी इरादा भी शामिल है, वे विवाह के सबसे करीब हैं, और ऐसे ही रिश्ते इस धारा (498A) के तहत सुरक्षा के हकदार होंगे. पीठ ने कहा, "हमारी राय में, यही विशिष्ट आवश्यकता एक 'विवाह की प्रकृति वाले रिश्ते' (जैसा कि इसे घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के उद्देश्यों के लिए समझा जाता है जो स्वाभाविक रूप से एक नागरिक कानून है) और हमारे सामने मौजूद इस प्रावधान के बीच अंतर करेगी, जो आपराधिक दायित्व तय करता है."

पीठ ने कहा कि यदि कोई महिला विवाह से पहले भी एक घरेलू व्यवस्था (लिव-इन) में रह रही है, जो आज के समय में शहरी क्षेत्रों में कुछ हद तक एक हकीकत है, तो विवाहित महिला को मिलने वाली सुरक्षा उन्हें भी दी जानी चाहिए. पीठ ने कहा, "क्रूरता किसी भी रूप में हो, वह दरवाजा देखकर नहीं आती कि जिस घर में वह प्रवेश कर रही है, वह किसी विवाहित महिला का है या नहीं. एक बार जब यह प्रवेश कर जाती है, तो विनाश करने की इसकी प्रवृत्ति और अधिक बढ़ जाती है."

पीठ ने कहा कि इसलिए यह माना जाता है कि "विवाह की प्रकृति वाले रिश्ते" में रहने वाली महिला को धारा 498A के तहत सुरक्षा दी जाएगी. इसके लिए, इस धारा के सुधारात्मक और सामाजिक रूप से कल्याणकारी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए "पति" शब्द की एक उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की गई है. पीठ ने कहा कि एक भी व्यक्ति यह जानकर या उम्मीद करके किसी रिश्ते में नहीं जाता कि उसके साथ क्रूरता की जा सकती है. कोर्ट ने कहा कि जब कोई जोड़ा अपनी यात्रा शुरू करता है, तो हर कोई यही मानता है कि यह हमेशा बेहतरीन इरादों और हर तरह की खुशियां लाने के लिए होता है.

शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि धारा 498A उन "लिव-इन रिलेशनशिप" पर लागू होती है जो "विवाह की प्रकृति वाले रिश्ते" की श्रेणी में आते हैं, और जिनमें शादी करने का इरादा इसका एक अनिवार्य हिस्सा साबित होता है.

शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक फैसले को बरकरार रखते हुए कीं. उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता-पति के खिलाफ क्रूरता की कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसने आईपीसी की धारा 498A के तहत मुकदमे से छूट का दावा करते हुए यह दलील दी थी कि यह प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू नहीं होता है.

आरोप हैं कि आरोपी-अपीलकर्ता और प्रतिवादी नंबर 2 (महिला) ने अक्टूबर 2010 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी और तब से वे बेंगलुरु में रह रहे थे. हालांकि, साल 2016 में दोनों के वैवाहिक जीवन में कड़वाहट आ गई, जिसके बाद यह मौजूदा अपील दायर की गई.

दोनों पक्षों के बीच विवाद एक बुनियादी बात को लेकर है कि उनकी शादी हुई थी या नहीं. आरोपी-अपीलकर्ता का तर्क है कि उनकी शादी कभी हुई ही नहीं, इसलिए धारा 498A लागू होने का सवाल ही नहीं उठता. दूसरी ओर, प्रतिवादी नंबर 2 (महिला) का कहना है कि वे एक वैध विवाह बंधन में थे, इसलिए जिन धाराओं में अपीलकर्ता पर आरोप लगाए गए हैं, वे पूरी तरह से लागू होती हैं.

उच्च न्यायालय ने माना कि आईपीसी की धारा 498A में "पति" शब्द केवल कानूनी रूप से वैध शादी करने वाले व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है. इसका दायरा उस व्यक्ति तक भी है जो ऐसे वैवाहिक संबंध में प्रवेश करता है जो अमान्य (शून्य) या रद्द करने योग्य हो. साथ ही, यह उस लिव-इन रिलेशनशिप पर भी लागू होता है जिसमें विवाह के लक्षण मौजूद हों, बशर्ते इस धारा की व्याख्या में परिभाषित क्रूरता की आवश्यक शर्तें पूरी होती हों.

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