उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने के लिए बनाए गए फोरम के हालात से सुप्रीम कोर्ट चिंतित
उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने के लिए कंज्यूमर कोर्ट का गठन किया गया था। लेकिन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी हैं। इसमें बड़ी संख्या में मामले लंबित पड़े हैं और साथ ही कई पद भी खाली पड़े हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर…

सौजन्य से:- Navbharat Times
उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने के लिए कंज्यूमर कोर्ट का गठन किया गया था। लेकिन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी हैं। इसमें बड़ी संख्या में मामले लंबित पड़े हैं और साथ ही कई पद भी खाली पड़े हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता जताई है।
देश की उपभोक्ता अदालतें आम आदमी को खराब उत्पाद, सेवा में कमी और लापरवाही के खिलाफ तुरंत न्याय देने के लिए बनाई गई थीं। लेकिन, लंबित मामलों और अदालतों में खाली पदों ने इस व्यवस्था को संकट में डाल दिया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता जताई है। जिस तंत्र को त्वरित और आसान न्याय का जरिया बनना था, वह खुद पेंडेंसी और वैकेंसी की चिंता से जूझ रहा है।
दो करोड़ का मुआवजा
उपभोक्ता अदालतों की अहमियत समझने के लिए हाल की दो घटनाओं पर नजर डालना जरूरी है। पहला मामला गलत हेयरकट का है। अप्रैल 2018 में दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल के सैलून में महिला के बाल उनकी अपेक्षा से काफी छोटे काट दिए गए। महिला ने दावा किया कि इससे उन्हें मानसिक आघात पहुंचा और पेशेवर नुकसान भी हुआ। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने महिला को दो करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया । शीर्ष अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी क्षतिपूर्ति के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं और इसीलिए अदालत ने मुआवजे की रकम घटाकर 25 लाख रुपये कर दी।
समयबद्ध सुनवाई जरूरी
दूसरा मामला 2003 के RAW मुख्यालय की लिफ्ट दुर्घटना से जुड़ा है । इसमें एक अधिकारी की जान चली गई थी NCDRC ने लिफ्ट कंपनी, इंजीनियरिंग सर्विस और RAW की जिम्मेदारी तय करते हुए 3.01 करोड़ रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी लिफ्ट कंपनी की याचिका खारिज करते हुए यात्री सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया। इन फैसलों से पता चलता है कि उपभोक्ता अदालतें सिर्फ शिकायत निवारण का मंच नहीं, सेवा गुणवत्ता, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा की अहम संस्था हैं। इस व्यवस्था की प्रभावशीलता समयबद्ध सुनवाई पर निर्भर है।
यहां भी फैसलों में देरी
राज्य और जिला आयोगों में कई मामले सात साल से लटके हैं
2020 से 2024 के बीच उपभोक्ता मामलों की पेंडेंसी 21% बढ़ी
पिछले साल तक विभिन्न आयोगों में 40% पद खाली पड़े थे
कार्यप्रणाली पर सवाल
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उपभोक्ता न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC अध्यक्ष से लंबित मामलों की संख्या, आयोग के मौजूदा ढांचे, औसत निपटारा दर, निपटारे में लगने वाला समय और बेंचों की संख्या बढ़ाने की जरूरत पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने राज्य आयोगों से भी सालाना पेंडेंसी, वैकेंसी और सबसे पुराने लंबित मामलों का ब्योरा मांगा है।
बरसों का इंतजार
यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब पता चलता है कि कुछ मामले 2019 और 2020 से लंबित हैं। कुछ मामलों को 2022 में केवल एक बार सूचीबद्ध किया गया, लेकिन अब तक सुनवाई की अगली तारीख नहीं मिली। सवाल यह है कि यदि उपभोक्ता को न्याय के लिए चार बरस इंतजार करना पड़े तो फिर विशेष उपभोक्ता मंच का उद्देश्य क्या रह जाता है? सुप्रीम कोर्ट अब केवल पेंडेंसी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की क्षमता और जवाबदेही का आकलन करना चाहता है।
संरचनात्मक कमजोरी
मार्च में आई 'कंज्यूमर जस्टिस रिपोर्ट' से उपभोक्ता न्याय व्यवस्था की गंभीर स्थिति का पता चला। 2020 से 2024 के बीच उपभोक्ता मामलों की पेंडेंसी 21% बढ़कर 5.15 लाख हो गई । कानून की मंशा मामलों को तीन से पांच महीने में निपटाने की है, लेकिन एक-तिहाई से अधिक मामले तीन साल से ज्यादा पुराने हैं। केरल, जम्मू-कश्मीर और झारखंड में दो-तिहाई से अधिक मामले तीन साल से अधिक लंबित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक करीब आधे राज्य आयोगों और एक-तिहाई जिला आयोगों में अध्यक्ष नहीं थे। स्वीकृत पदों में करीब 40% खाली थे। यह संकट केवल NCDRC तक सीमित नहीं, पूरी तीन-स्तरीय उपभोक्ता न्याय व्यवस्था में संरचनात्मक कमजोरी दिखाता है।
अदालत का रुख
उपभोक्ता आयोगों में रिक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख पहले भी सख्त रहा है | अगस्त 2021 में अदालत ने केंद्र और राज्यों को समयबद्ध तरीके से खाली पद भरने, रिक्तियों को भरने के लिए विज्ञापन जारी करने और चयन समितियां गठित करने को कहा था। अदालत ने कहा था कि नियुक्तियों में देरी स्वीकार नहीं होगी । जरूरत पड़ने पर मुख्य सचिवों और उपभोक्ता मामलों के सचिव को तलब करने की भी चेतावनी दी थी। पांच साल बाद भी स्थिति जस की जस होना बताता है कि समस्या आदेशों के स्थायी अनुपालन की है।
मूल्यांकन जरूरी
सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि उपभोक्ता आयोगों में सदस्यों के प्रदर्शन और फैसलों की गुणवत्ता का मूल्यांकन होना चाहिए। राज्य आयोगों के फैसलों के खिलाफ बढ़ती अपीलें NCDRC पर बोझ बढ़ा रही हैं। इसलिए केवल राष्ट्रीय आयोग की बेंच बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। जिला और राज्य स्तर की व्यवस्था मजबूत करनी होगी । NCDRC की चार क्षेत्रीय या सर्किट बेंच उपभोक्ताओं की पहुंच आसान बना सकती हैं, लेकिन इसके लिए पर्याप्त सदस्य, स्टाफ और तकनीकी सुविधाओं की भी दरकार है। आखिरकार न्याय की मूल कसौटी समयबद्ध और विश्वसनीय निपटारा है।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें
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