सुप्रीम कोर्ट ने कहा: सेशन कोर्ट नहीं दे सकता ‘जीवन भर जेल’ की सजा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हत्या के मामले में सत्र अदालत ‘जीवन भर जेल’ के बिना छूट वाला आदेश नहीं दे सकती; यह अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों के पास है। कोर्ट ने ट्रिपल‑मर्डर मामले में ‘जीवन भर जेल’ की सजा को बदलकर 25 साल की कठोर सजा दी, जिसमें कोई छूट नहीं होगी।

सौजन्य से:- Hindustan
सेशन कोर्ट ‘जीवन भर जेल’ की सजा नहीं दे सकता : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सत्र अदालत हत्या के मामले में दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाते समय उसे 'जीवनभर जेल' में रखने का आदेश नहीं दे सकती। जस्टिस की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों के पास है और सेशन कोर्ट को सजा में छूट देने का अधिकार है।
एक अहम फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि सत्र अदालत किसी आरोपी को हत्या का दोषी ठहराते समय यह आदेश नहीं दे सकता कि दोषी अपनी बची हुई पूरी जिंदगी जेल में ही बिताएगा। यह फैसला एक पेचीदा कानूनी सवाल पर था कि क्या ट्रायल कोर्ट, आईपीसी की धारा-302 के तहत हत्या के मामले में दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाते समय यह कह सकता है कि दोषी अपनी बची हुई जिंदगी जेल में बिताएगा और उसे सजा में छूट या सजा कम करने का कानूनी फायदा नहीं मिलेगा। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने पिछले फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि हालांकि उम्रकैद का मतलब दोषी की बची हुई ज़िंदगी भर की जेल होती है, लेकिन सजा में छूट और सजा कम करने की कानूनी शक्तियों को सत्र अदालत कम नहीं कर सकती।
इसलिए, बिना छूट वाली उम्रकैद की विशेष श्रेणी की सजा देने का अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास है, न कि सेशन कोर्ट के पास।पीठ ने यह भी कहा की सीआरपीसी के तहत सजा में छूट और सजा कम करने की शक्ति को सेशन कोर्ट कम नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि सेशन कोर्ट का यह निर्देश कि उम्रकैद दोषी की प्राकृतिक जिंदगी के अंत तक जारी रहेगी, कानूनी व्यवस्था के खिलाफ है। मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए, पीठ ने ट्रिपल-मर्डर केस में एक व्यक्ति और एक अन्य दोषी की सजा को बरकरार रखा, लेकिन ‘जीवन भर जेल’ की सजा को बदलकर 25 साल की कठोर सजा कर दिया, जिसमें सजा में छूट का कानूनी फायदा नहीं मिलेगा।
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