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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: एसआईआर से बाहर होने पर नागरिकता नहीं जाएगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मतलब यह नहीं है कि नागरिकता अपने आप चली जाएगी, लेकिन अन्य अधिकारों के बारे में कोई निर्देश नहीं दिया गया है. यह मामला पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है.

18 जुलाई 2026 को 11:13 am बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: एसआईआर से बाहर होने पर नागरिकता नहीं जाएगी

सौजन्य से:- The Wire - Hindi

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 जुलाई) कहा कि चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाए जाने का मतलब यह नहीं है कि नागरिकता अपने आप चली जाएगी.

यह टिप्पणी शीर्ष अदालत द्वारा लगभग दो महीने पहले दिए गए उस निर्देश के बाद आई है, जिसमें चुनाव आयोग से कहा गया था कि जिन लोगों के नाम ‘संदिग्ध नागरिकता’ के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके नाम आगे की कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को भेजे जाएं.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ प्रसेनजीत बोस द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी. याचिका में उन अपीलीय न्यायाधिकरणों में सुनवाई की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए विभिन्न निर्देशों की मांग की गई है, जिन्हें एसआईआर से बाहर रखे गए लोगों की अपीलों की सुनवाई के लिए गठित किया गया है.

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत के सामने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए. उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों में अभी भी 34 लाख अपीलें लंबित हैं. वहीं, अब तक जिन 38,000 अपीलों का निपटारा हुआ है, उनमें से कम-से-कम 70 प्रतिशत लोगों के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं.

उन्होंने यह भी बताया कि अब तक इन न्यायाधिकरणों से दो न्यायाधीश इस्तीफा दे चुके हैं.

उन्होंने कहा कि अपीलों के लंबित रहने और प्रक्रिया के अत्यधिक लंबी होने के बीच पश्चिम बंगाल की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने ऐसी अधिसूचनाएं जारी की हैं, जिनके तहत एसआईआर से बाहर किए गए लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लाभ और अन्नपूर्णा योजना जैसी अन्य कल्याणकारी योजनाओं से वंचित किया जा रहा है. शंकरनारायणन ने यह भी कहा कि ऐसे लोगों को जाति प्रमाणपत्र तक जारी नहीं किए जा रहे हैं.

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि ‘लक्ष्मीर भंडार’ योजना के 30 लाख लाभार्थी उनकी नई सरकार की अन्नपूर्णा योजना के लिए पात्र नहीं होंगे. ‘लक्ष्मीर भंडार’ पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार की प्रमुख कल्याणकारी योजना थी. वहीं, उनकी मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने सरकार बनने के तुरंत बाद द वायर से कहा था कि एसआईआर में जिन लोगों के नाम हटाए जाएंगे, उन्हें कल्याणकारी योजनाओं के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता भी नहीं मिलेगी.

एसआईआर के कारण नागरिकों को केवल कल्याणकारी योजनाओं से ही नहीं, बल्कि अन्य अधिकारों से भी वंचित किए जाने के आरोप सामने आए हैं. द टेलीग्राफ के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल ने बताया था कि अधिकारियों ने उन्हें सूचित किया कि उनका पासपोर्ट नवीनीकरण इसलिए नहीं किया जा रहा क्योंकि उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है.

शंकरनारायणन की दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस बागची ने कहा कि बिहार एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, चुनाव आयोग नागरिकता तय करने वाला संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘बिहार एसआईआर मामले में हमने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि जैसे ही कोई फैसला हो, वह नागरिकता अधिनियम के तहत फैसले के लिए मामले को संबंधित मंत्रालय के पास भेजे. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक व्यक्ति की नागरिकता की स्थिति वैसी ही बनी रहेगी.’

इस पर शंकरनारायणन ने कहा कि सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ केवल मतदाता सूची में नाम होने के आधार पर दिया जाएगा. उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि माननीय जजों को इसका अंदाज़ा था, क्योंकि अगर होता तो शायद आप एक लाइन और जोड़ देते कि जब तक मामले पर फ़ैसला नहीं हो जाता, तब तक नागरिकों को मिलने वाले दूसरे नागरिक अधिकार न छीने जाएं.’

हालांकि अदालत ऐसा निर्देश देने के पक्ष में नहीं दिखी.

जस्टिस बागची ने कहा, ‘हमारा फैसला बिल्कुल स्पष्ट है. संविधान के अनुच्छेद 9, 10, 11 और 12 के तहत नागरिकता की स्थिति निर्धारित करने का संवैधानिक अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है. चुनाव आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची तक सीमित है. वह यह तय कर सकता है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं. लेकिन केवल नाम हट जाने से अपने-आप नागरिकता समाप्त नहीं हो जाती. इसलिए हमने उसके साथ संबंधित जिम्मेदारी भी की है.’

इसके बाद पीठ ने इस मामले की सुनवाई को पश्चिम बंगाल में एसआईआर को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ दोबारा सूचीबद्ध कर दिया.

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