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फास्ट ट्रैक कोर्ट: जानें क्या होती है फास्ट ट्रैक कोर्ट और इसके क्या फायदे

भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट गंभीर और प्राथमिकता वाले मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें हैं। यहां पर महिलाओं के विरुद्ध अपराध, पोक्सो मामलों और दुष्कर्म जैसे मामलों की सुनवाई होती है। जल्द न्याय देने के चक्कर में न्याय की अनदेखी नहीं की जाती है।

23 जुलाई 2026 को 12:14 pm बजे
फास्ट ट्रैक कोर्ट: जानें क्या होती है फास्ट ट्रैक कोर्ट और इसके क्या फायदे

सौजन्य से:- Navbharat Times

Fast Track Court : भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट गंभीर और प्राथमिकता वाले मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतें हैं। हालांकि इनका उद्देश्य न्याय में देरी कम करना है, लेकिन हर मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं जाता। जानिए इनके गठन, प्रक्रिया, लाभ और चुनौतियों से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।

नई दिल्ली: भारत में लगभग हर अदालतों में सालों से इतने ज्यादा लंबित मामले हैं कि उनको निबटाना एक चुनौती है। इसी समस्या के समाधान के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा सामने आई। इन विशेष अदालतों का उद्देश्य गंभीर और संवेदनशील मामलों का समयबद्ध निस्तारण करना है ताकि पीड़ितों को सालों तक न्याय का इंतजार न करना पड़े। हालांकि एक सच यह भी है कि लोगों के मन में यह आम धारणा है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट में हर मामले की सुनवाई हो सकती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि हर मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं भेजा जा सकता। इन अदालतों का गठन विशेष श्रेणी के मामलों और राज्य सरकारों की आवश्यकता के अनुसार किया जाता है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट Fast Track Court क्या है और इसकी शुरूआत कब हुई

देश भर में लंबित मामलों का बोझ कम करने के उद्देश्य से साल 2000 में भारत के 11वें वित्तीय आयोग ने देश भर में फास्ट ट्रैक कोर्ट को बनाए जाने की योजना पेश की। फिर वित्त आयोग की सिफारिश पर वित्त मंत्रालय ने पूरे भारत में फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन के लिए धन आवंटित किया। राज्यों में जल्दी सुनवाई और न्याय देने के उद्देश्य से उच्च न्यायालयों के परामर्श से फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार को दी गई। जिसके बाद पूरे देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए।

किन मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में होती है?

दरअसल, हर मुकदमा या मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं होती।

सामान्य दीवानी या आपराधिक मामलों को फास्ट ट्रैक अदालतों में स्वतः स्थानांतरण संभव नहीं है। क्योंकि इनमें गवाहों और साक्ष्यों का एक लंबा सिलसिला चलता है, फास्ट ट्रैक अदालतें में ऐसे मामले नहीं आते।

महिलाओं के विरुद्ध अपराध, POCSO मामलों, दुष्कर्म, कुछ गंभीर अपराधों तथा लंबे समय से लंबित विशेष मामलों की सुनवाई यहां होती है।

कई राज्यों में वरिष्ठ नागरिकों अथवा पांच वर्ष से अधिक पुराने कुछ मामलों को भी प्राथमिकता दी जाती है।

एक बड़ी बात यह भी है कि यदि कोई पक्ष जल्दी सुनवाई चाहता है तो वह संबंधित उच्च न्यायालय से अपने मामले को फास्ट ट्रैक में भेजे जाने के लिए उचित निर्देश मांग सकता है।

इस मामले में अंतिम फैसला संबंधित न्यायिक व्यवस्था और लागू नियमों पर निर्भर करता है। इसलिए केवल जल्दी फैसला चाहिए कहने से मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित नहीं होता।

फास्ट ट्रैक कोर्ट के फायदे और कानूनी चुनौतियां

देखा जाए तो फास्ट ट्रैक कोर्ट का सबसे बड़ा लाभ न्यायिक देरी को कम करना है। इससे पीड़ितों को अपेक्षाकृत कम समय में न्याय मिलने की संभावना बढ़ती है। लंबे समय से विचाराधीन कैदियों के मामलों में भी जल्दी सुनवाई बड़ी बात साबित होती है। दूसरी ओर इन अदालतों के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। फिर पर्याप्त न्यायाधीशों की कमी, आधारभूत ढांचे का अभाव, कई बार फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी तथा तकनीकी संसाधनों की कमी भी इसके दायरे और असर को सीमित करती है। कई राज्यों में अदालतों की संख्या भी आवश्यकता से कम है।

क्या जल्दी फैसले के चक्कर में न्याय की अनदेखी होती है

ऐसे मामलों में गौर करने वाली बड़ी बात यह है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्देश्य समयबद्ध सुनवाई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रक्रिया में कानूनी मानकों से समझौता किया जाए। जल्द न्याय देने के चक्कर में न्याय की अनदेखी न हो, इसका ध्यान रखा जाता है। इसीलिए सभी पक्षों को सुनना, साक्ष्यों का परीक्षण और निष्पक्ष निर्णय न्यायालय की प्राथमिक जिम्मेदारी रहती है। साथ ही साथ महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के लिए कई राज्यों में अलग से Fast Track Special Courts (FTSCs) भी संचालित किए जा रहे हैं। इसके जरिए संवेदनशील मामलों के निस्तारण की गति बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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