सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी केस में ट्रायल जज की कार्यवाही की जांच हेतु इलाहाबाद हाई कोर्ट को भेजा आदेश
लखीमपुर खीरी में 2021 की किसान विरोध में हुई घातक दुर्घटना से जुड़े मामले में पीड़ितों ने जज के व्यवहार और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के बदले जाने को लेकर आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने इस शिकायत को इलाहाबाद हाई कोर्ट को भेज कर उचित कार्रवाई की मांग की और उत्तर प्रदेश सरकार को वरिष्ठ पीपी नियुक्त करने का निर्देश दिया।

सौजन्य से:- hindi.livelaw.in
Lakhimpur Kheri Case | पीड़ितों ने ट्रायल जज पर सवाल उठाए, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से जांच करने को कहा
Shahadat
22 Sept 2026 4:55 PM IST
आशीष मिश्रा से जुड़े लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज ट्रायल जज पर आरोप लगाने वाली एक अर्ज़ी उचित कार्रवाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट को भेज दी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता द्वारा दायर उस अर्ज़ी को आगे भेजे जिसमें पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (PP) के बदलने और ट्रायल जज के व्यवहार को लेकर चिंता जताई गई। बेंच ने मौखिक रूप से यूपी सरकार (जिसका प्रतिनिधित्व वकील रुचिका गोयल कर रही थीं) से कहा कि वे यह सुनिश्चित करें कि केस की पैरवी के लिए एक सीनियर PP को नियुक्त किया जाए।
बेंच ने आदेश दिया,
"रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वह अर्ज़ी की एक कॉपी इलाहाबाद हाई कोर्ट को भेजे और उनसे मामले को देखने और उचित सुधारात्मक कार्रवाई करने का अनुरोध करे। हाईकोर्ट, माननीय चीफ जस्टिस द्वारा की जा सकने वाली कार्रवाई के बाद इस कोर्ट को सीलबंद लिफ़ाफ़े में रिपोर्ट भेजेगा।"
यह मामला अक्टूबर 2021 में 8 लोगों की मौत से जुड़ा है, जब कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान मिश्रा के काफिले से जुड़ी गाड़ियों ने 4 प्रदर्शनकारी किसानों को कुचल दिया था। मिश्रा पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे हैं।
शिकायतकर्ता/पीड़ितों की ओर से वकील प्रशांत भूषण पेश हुए और उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल जज/पीठासीन अधिकारी का व्यवहार "चौंकाने वाला" था। वकील ने बीमार गवाह के खिलाफ जज द्वारा गैर-जमानती वारंट जारी करने पर आपत्ति जताई। भूषण ने आगे कहा कि अन्य मामलों में भी जज का व्यवहार सवाल खड़े करता है, क्योंकि वे अन्य अदालतों से मामले अपने पास मंगाकर आरोपियों को बरी कर रहे थे।
भूषण ने कहा,
"कुछ परेशान करने वाली घटनाएं हुई हैं। जो जज अभी इसे देख रहे हैं... उन्होंने जो किया है वह काफी चौंकाने वाला है। उन्होंने NDPS, SC/ST मामलों को अपने पास मंगाया और ज़मानत दे दी... ऐसे मामलों में लोगों को बरी कर दिया जो ट्रायल के आखिरी चरण में थे। इस मामले में उन्होंने पहले एक चश्मदीद गवाह के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। उन्होंने इस मामले में मनमानी की है! सिर्फ़ इस मामले में नहीं, बल्कि कई मामलों में। बीमारी की पर्ची और डॉक्टर का सर्टिफ़िकेट दिया गया। अब इस जज के खिलाफ जांच शुरू हो गई। पुलिस इस गवाह के पास गई, तो उसने कहा कि माफ़ कीजिए, मैं पेश नहीं होना चाहता।"
सबसे पहले, CJI ने कहा कि ट्रायल जज पर दबाव ज़रूर होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को तय समय में पूरा करने का निर्देश दिया।
CJI ने टिप्पणी की,
"एक तरफ़ हम कहते हैं कि काम तेज़ी से हो। फिर PP कहते हैं कि मेरा गवाह उपलब्ध नहीं है। कभी-कभी अधिकारी को कदम उठाने पड़ते हैं। अधिकारी पर दबाव देखिए। यह हमें मंज़ूर नहीं है।"
हालांकि, भूषण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जज ने NDPS केस भी खुद के पास ले लिए, जिनके लिए एक स्पेशल कोर्ट होती है।
इस पर CJI ने जवाब दिया,
"हमें NDPS केस से कोई मतलब नहीं है। हो सकता है कि 1 गवाह न आया हो... PP को यह बताना होगा कि गवाह किसी वाजिब वजह से नहीं आ पा रहा है।"
इसके बाद भूषण ने बताया कि जिस पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को केस सौंपा गया, उसे भी बदलकर एक नया, अनुभवहीन प्रॉसिक्यूटर नियुक्त कर दिया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केस से जुड़ा साइट प्लान कोर्ट के रिकॉर्ड से "गायब" हो गया है।
भूषण ने कहा,
"यह जज ज़िले में मनमानी कर रहा है। ज़रा देखिए कि कितने केस में लोग बरी हुए हैं। कानून के तहत वह केस खुद के पास नहीं ले सकता।"
हालांकि, जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि इस बात पर हाई कोर्ट को ध्यान देना चाहिए।
फिर भूषण ने कोर्ट से गुज़ारिश की कि ट्रायल जज को बदला जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने प्रॉसिक्यूटर के कामकाज पर सवाल उठाए और कहा कि कुछ अहम गवाहों को छोड़ दिया गया।
इस मौके पर जस्टिस बागची ने राज्य के वकील से कहा कि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का गवाहों को छोड़ना "बहुत निष्पक्ष प्रॉसिक्यूशन नहीं होगा"।
भूषण ने फिर ज़ोर देकर कहा कि ट्रायल जज को बदला जाना चाहिए।
उन्होंने कहा,
"अगर वह [जज] इस केस को आगे बढ़ाते हैं... तो मैं गारंटी दे सकता हूं कि क्या होगा। वे कहेंगे कि कोई घटना नहीं हुई, साइट प्लान नहीं है। अगर यह अधिकारी केस को आगे बढ़ाता है, तो न्याय के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा।"
आखिरकार, बेंच ने ऊपर दिया गया आदेश पारित करते हुए अर्ज़ी को हाईकोर्ट भेज दिया।
Case: Ashish Mishra alias Monu v. State of U.P. SLP(Crl) No. 7857/2022
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