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सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST अधिनियम के 2018 संशोधनों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज किया

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में किए गए SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती जनहित याचिका को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि 2020 के अपने फैसले में उसने उन प्रावधानों को पहले ही मान्य कर लिया था। अदालत ने कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति हटाने और अग्रिम जमानत पर रोक जैसी व्यवस्था पर पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, इसलिए याचिकाकर्ता की पुनर्विचार की माँग को स्वीकार नहीं किया गया।

22 सितंबर 2026 को 06:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST अधिनियम के 2018 संशोधनों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज किया

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के 2018 के संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में 2018 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया।

2020 में पहले ही हटा दी थी ये शर्त

कोर्ट ने कहा कि इन संशोधित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को वह 2020 में पहले ही बरकरार रख चुका है। संशोधित कानून के तहत आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की शर्त भी हटा दी गई थी और अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक बहाल कर दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने 2020 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की, जिसे पीठ ने स्वीकार नहीं किया।

अग्रिम जमानत पर रोक को लेकर आपत्ति

जैन ने दलील दी कि SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ के समान है और इन प्रावधानों के दुरुपयोग की आशंका है। उन्होंने एक्ट के तहत दर्ज मामलों में कम दोषसिद्धि दर का भी हवाला दिया और मुआवजा वितरण की व्यवस्था पर सवाल उठाया।

2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदला कानून

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत कुछ मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच का निर्देश दिया था। कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी से पहले नियुक्ति प्राधिकारी की मंजूरी की आवश्यकता भी बताई थी। साथ ही, जहां प्रथमदृष्टया मामला नहीं बनता हो, वहां उचित मामलों में अग्रिम जमानत देने का रास्ता खुला रखा था।

2018 में संसद ने संशोधन कर जोड़ी थी धारा

इसके बाद संसद ने 2018 में कानून में संशोधन कर धारा 18A जोड़ी। इसके तहत SC/ST एक्ट के मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता खत्म कर दी गई। आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की शर्त भी हटा दी गई और अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक बहाल कर दी गई।

2020 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन को बरकरार रखा था

2018 के संशोधन को बाद में ‘पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत सरकार’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई थी। वर्ष 2020 में शीर्ष अदालत ने संशोधित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी। मंगलवार को पीठ ने इसी फैसले का हवाला देते हुए मौजूदा PIL पर विचार करने से इनकार किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून के संभावित दुरुपयोग से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय पहले ही निर्धारित किए जा चुके हैं

लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी, नवभारत टाइम्स में लीगल एडिटर हैं। वह 22 साल से भी ज्यादा वर्षों से लीगल रिपोर्टिंग कर रहे हैं। शुरुआत में वह दिल्ली की निचली अदालत और सीबीआई कवर करते थे और बाद में वह दिल्ली हाई कोर्ट और फिर लगातार डेढ़ दशक से सुप्रीम कोर्ट कवर कर रहे हैं। इस दौरान राजेश ने देश के तमाम हाई प्रोफाइल केस नीतीश कटारा मर्डर केस, जेसिक लाल केस, बोफोर्स केस, उपहार केस, पार्लियामेंट अटैक केस, प्रिय दर्शनी मट्टू केस से लेकर तमाम संवैधानिक मसले कवर किए जिनमें अनुच्छेद-370, तीन तलाक, निजता का अधिकार, होमो सेक्सुअलिटी को अपराध से बाहर करने का मामला और राम मंदिर मसले अहम है। राजेश ने इस 22 साल के करियर के दौरान दो साल 2006 से लेकर 2007 के सितंबर तक सहारा समय टीवी चैनल में भी बतौर लीगल संवावददाता काम किया। इसके बाद दोबारा वह नवभारत टाइम्स आए और उसके बाद लगातार कानूनी अफेयर्स को कवर करते रहे। नेशनल ब्यूरो में रहते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय को कवर करने के साथ साथ कानून के विषय पर लगातार एडिट पेज पर लिख रहे हैं। साथ ही लगातार ऑनलाइन माध्यम के लिए भी सक्रिय रिपोर्टिंग करते रहे हैं और ..कोर्ट रूम..नाम के एक साप्ताहिक विडियो इंटरव्यू भी लगातार देते हैं जिनमें सप्ताह भर के मुख्य कानूनी मसले पर उनका साक्षात्कार प्रसारित होता है। इसके अलावा वह लगातार लीगल मसले पर लीगल फोरम नामक कॉलम भी लिखते रहे हैं। उन्होंने दरभंगा के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से केमिस्ट्री में एमएससी किया है। साथ ही उन्होंने जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा किया और एलएलबी भी कर रखा है।... और पढ़ें

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