सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर हिंसा मामले के जज की आचरण रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को 2021 के लखीमपुर खीरी हिंसा मामले की सुनवाई कर रहे जज के व्यवहार पर सीलबंद रिपोर्ट जमा करने को कहा है, जहाँ जज पर एनडीपीएस व एससी‑एसटी से जुड़े मामलों को अपने पास ले जाने और आरोपी को बरी या जमानत देने का आरोप है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि एक गवाह की बीमारी के कारण गैर‑जमानती वारंट जारी किया गया और सुनवाई के बीच में सरकारी अभियोजक को बदल दिया गया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को दो हफ्तों के भीतर अनुभवी वरिष्ठ अभियोजक नियुक्त करने और अगले दो हफ्तों में अगली सुनवाई तय करने का निर्देश दिया।

सौजन्य से:- livehindustan.com
लखीमपुर हिंसा मामला : सुप्रीम कोर्ट ने जज की आचरण रिपोर्ट मांगी
- अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को दिए निर्देश - जज पर कई
नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से 2021 के चर्चित लखीमपुर खीरी हिंसा मामले की सुनवाई कर रहे जज के आचरण पर रिपोर्ट मांगी है। जज पर आरोप है कि उन्होंने कई एनडीपीएस और एससी-एसटी से जुड़े मामलों को अपने पास स्थानांतरित किया और आरोपियों को बरी कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश के साथ सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश वी. मोहना की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा कि वह आरोपों पर गौर करने और जरूरी सुधारात्मक कार्रवाई करने के बाद अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश करें। लखीमपुर खीरी हिंसा मामले के एक प्रत्यक्षदर्शी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि उनके मुवक्किल के बीमारी के कारण अदालत में पेश नहीं हो पाने के बाद न्यायिक अधिकारी ने उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया। उन्होंने कोर्ट में कहा कि मामले की सुनवाई कर रहे जज ने एनडीपीएस और एससी-एसटी से जुड़े मामलों को अपने पास स्थानांतरित कराया और आरोपियों को जमानत दे दी या उन्हें बरी कर दिया। कानून के तहत वह इन मामलों को अपने पास स्थानांतरित नहीं कर सकते।
सुनवाई में बदलाव
सुनवाई के दौरान ही सरकारी अभियोजन को बदला
प्रशांत भूषण ने दावा किया कि मामले की सुनवाई के बीच में ही सरकारी अभियोजक को भी बदल दिया गया और नए अभियोजक के पास महज चार महीने का अनुभव है। इस पर पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि वह ऐसे वरिष्ठतम सरकारी अभियोजक की तलाश करे, जिसे मामले में सत्र अदालत में मुकदमे की कार्यवाही का पर्याप्त अनुभव हो और दो सप्ताह के भीतर कोर्ट को इसकी जानकारी दे। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है.
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