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उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षा की संकट की गहराई, नितिगत पंगुपन और नौकरशाही की फाइलों में उलझे नियम

उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षा का खेल गोविंदा गिले शिले का नहीं बल्कि फाइलों में उलझे नियमों और नितिगत पंगुपन का है।

10 जुलाई 2026 को 02:57 pm बजे
उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षा की संकट की गहराई, नितिगत पंगुपन और नौकरशाही की फाइलों में उलझे नियम

सौजन्य से:- ETV Bharat

द ग्रेट संस्कृत क्राइसिस; फाइलों में दफन कानून, बोर्डों का टकराव और यूपी में दम तोड़ती देवभाषा

नीतिगत पंगुपन की शिकार संस्कृत! अध्यादेश और कोर्ट के चक्कर में क्यों 'गुरु-विहीन' हो गए उत्तर प्रदेश के गुरुकुल?

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : July 10, 2026 at 4:58 PM IST

|Updated : July 10, 2026 at 5:19 PM IST

फिरोजाबाद: जब सरकारें सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक मंच पर ले जाने का संकल्प दोहराती हैं तो पर्दे के पीछे की एक कड़वी हकीकत हमारा ध्यान खींचती है. उत्तर प्रदेश में संस्कृत शिक्षा का संकट किसी एक स्कूल या जिले की प्रशासनिक सुस्ती नहीं है, यह नीतिगत विफलता, नौकरशाही की फाइलों में उलझे नियमों और विधायी अदूरदर्शिता का एक जीवंत और दुखद उदाहरण है. राज्य के करीब 900 से अधिक सहायता प्राप्त संस्कृत विद्यालयों में से आधे से ज्यादा आज वेंटिलेटर पर हैं.

नियमों को बदलने के उत्साह में शासन ने एक ऐसी कानूनी भूलभुलैया तैयार कर दी है, जिसने पिछले आठ वर्षों से नियमित शिक्षकों की बहाली को पूरी तरह ठप कर रखा है. प्रोजेक्ट अलंकार' के तहत चमकाई जा रही दीवारों के पीछे से गुरु और शिष्य दोनों गायब हो रहे हैं. आइए समझते हैं अविनाश कुमार के संपादन के साथ संवाददाता अरविंद शर्मा की खास रिपोर्ट में कैसे लखनऊ के गलियारों से निकले आधे-अधूरे नीतिगत फैसलों ने उत्तर प्रदेश में देवभाषा के पूरे बुनियादी ढांचे को जमींदोज कर दिया.

फिरोजाबाद के सरकारी सहायता प्राप्त श्री हनुमान संस्कृत महाविद्यालय को कभी अपनी गुणवत्तापूर्ण आवासीय गुरुकुल के कारण मिनी काशी कहा जाता था, लेकिन आज महाविद्यालय पूरी तरह से गुरु-विहीन हो चुका है. 30 जून 2026 को संस्थान के आखिरी बचे शिक्षक राम प्रकाश शास्त्री के सेवानिवृत्त होते ही इस ऐतिहासिक गुरुकुल की रीढ़ टूट गई.

गुरुकुल के पास अपना विशाल परिसर: हालत यह है कि आज गुरुकुल के पास अपना विशाल परिसर, ट्रस्ट की दान की हुई करोड़ों की जमीन है और वेद-पुराण पढ़ने के इच्छुक छात्रों की कतार होने के बाद भी उन्हें संस्कृत का क ख ग... या कहें कि अ इ उ ण सिखाने वाला एक भी स्थायी शिक्षक नहीं बचा है.

हालांकि, मैनेजमेंट के अनुरोध पर कुछ पुराने गुरू ही अपनी अस्थायी सेवाएं देकर इस टूटती सांस को थामे हुए हैं, लेकिन सवाल यह है कि शिक्षा विभाग की 'लेटर पॉलिटिक्स' और बनारस के संपूर्णानंद विश्वविद्यालय को लिखे गए पत्रों के भरोसे यह व्यवस्था कब तक चलेगी? आज यह सन्नाटा हमारे नीति निर्माताओं और खोखले दावों से कई गंभीर सवाल पूछ रहा है?

साल 1940 में स्थापना: बता दें कि श्री हनुमान संस्कृत महाविद्यालय शहर के बीचों बीच हनुमान मंदिर के परिसर में ही स्थित है. यह महाविद्यालय काशी के संपूर्णानंद विश्वविद्यालय से संबद्ध है. देव भाषा संस्कृत का विकास और संस्कृत के विद्वानों को तैयार करने के मकसद से हनुमान ट्रस्ट ने इस महाविद्यालय के लिए जमीन दान की और साल 1940 में इसकी स्थापना हुई.

इस महाविद्यालय में प्राचार्य समेत कुल पांच अचार्यों के पद सृजित हैं. बीते 66 सालों से संचालित यह महाविद्यालय सरकार की बेरुखी का शिकार होता गया. इतने सालों में कोई नई नियुक्ति तो नहीं हुई, लेकिन धीरे-धीरे शिक्षक सेवानिवृत्त होते गए. अपने इतिहास में इस संस्कृत महाविद्यालय ने कई विद्वान भी दिए हैं. सरकार की बेरुखी का नतीजा है कि इस महाविद्यालय में केवल 10 छात्र ही अध्यनरत हैं.

30 जून को सेवानिवृत्त हो गए: हालांकि, यहां छात्रावास भी है, लेकिन वार्डन आदि की नियुक्ति न होने से वह भी बंद पड़ा है. इस महाविद्यालय में सेवाएं देने वाले एकमात्र शिक्षक राम प्रकाश शास्त्री 30 जून को सेवानिवृत्त हो गए. सेवानिवृत्त शिक्षक राम प्रकाश शास्त्री का कहना है कि महाविद्यालय में शिक्षक न होने से हम खुद परेशान हैं. हमने समय-समय पर इसकी जानकारी भी मैनेजमेंट कमेटी को दी और शिक्षकों की कमी सभी की जानकारी में है.

उन्होंने बताया कि हम लोगों ने खुद ही बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया है और एक अन्य आचार्य की तैनाती मैनेजमेंट द्वारा की गई है. महाविद्यालय के छात्र कॉलेज के एकमात्र शिक्षक के सेवानिवृत्त होने से परेशान तो हैं, लेकिन मैनेजमेंट कमेटी के फैसले से आशान्वित भी हैं. छात्र धीरज ने बताया कि जब मैनेजमेंट ने नए शिक्षक की तैनाती कर दी है तो शायद पठन-पाठन में कोई समस्या न आये.

महाविद्यालय के प्रबंधक द्विजेन्द्र मोहन शर्मा ने कहा, यह बड़े अफसोस की बात है कि देश और प्रदेश में डबल इंजन की सरकार है और सनातन संस्कृति की दुहाई भी दी जा रही है, लेकिन संस्कृत विद्यालय दुर्दशा के शिकार है. बताया कि यह महाविद्यालय साल 1940 से संचालित है और महाविद्यालय ने कई विद्वान भी दिए हैं, लेकिन अब इस महाविद्यालय में पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं है. जबकि हम लोग कई बार सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय को अवगत भी करा चुके हैं.

बताया कि जिला विद्यालय निरीक्षक की तरफ से राजकीय हाईस्कूल के प्रिंसिपल को प्राचार्य का चार्ज दिया गया है. जबकि महाविद्यालय के दो शिक्षक अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इस संबंध में जब प्रभारी जिला विद्यालय निरीक्षक डॉ. यतेंद्र सिंह से बात की गई तो उनका कहना था कि फिहलाल महाविद्यालय के प्राचार्य का चार्ज वह खुद देख रहे हैं. विद्यालय में शिक्षकों की तैनाती के लिए संपूर्णानंद विश्वविद्यालय को पत्र लिखा गया है.

कॉल टू एक्शन: संस्कृत को सिर्फ भाषणों में 'गौरव' कहना और नीतियों में 'अनाथ' छोड़ देना, हमारी संस्कृति के साथ सबसे बड़ा मजाक है. क्या उत्तर प्रदेश सरकार को नए शिक्षा आयोग के जरिए तुरंत विशेष अभियान चलाकर इन बंद होते गुरुकुलों को बचाना चाहिए? इस गंभीर नीतिगत संकट पर अपनी बेबाक राय नीचे कमेंट में लिखें. यदि आप चाहते हैं कि देवभाषा केवल किताबों में न सिमटे, तो इस खोजी रिपोर्ट को नीति निर्माताओं और सरकार के शीर्ष मंत्रियों तक पहुंचाने के लिए जमकर शेयर करें.

यह भी पढ़ें: योगी सरकार का बड़ा फैसला: संस्कृत छात्रों के लिए डॉक्टर बनने की राह आसान, UP में खुलेंगे 5 आयुर्वेद गुरुकुलम्

यह भी पढ़ें: संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के ऑनलाइन कोर्स; घर बैठे करें ज्योतिष-वास्तु और कर्मकांड की पढ़ाई

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