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वोटर लिस्ट से नाम हटने से नागरिकता नहीं खत्म: SC का फैसला, समझें पूरी बात

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हट जाने से उसकी नागरिकता समाप्त नहीं होती। अदालत ने कहा कि नागरिकता का अंतिम निर्णय केवल केंद्र सरकार कर सकती है।

18 जुलाई 2026 को 02:14 am बजे
वोटर लिस्ट से नाम हटने से नागरिकता नहीं खत्म: SC का फैसला, समझें पूरी बात

सौजन्य से:- Navbharat Times

SC clarifies Citizenship: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) के दौरान किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाने मात्र से उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त नहीं होती। अदालत ने कहा कि नागरिकता का अंतिम निर्णय केवल केंद्र सरकार कर सकती है ..

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण Special Intensive Revision-SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ध्यान देने वाली है। मई महीने में पश्चिम बंगाल में SIR अभियान के दरम्यान लोगों के नाम मतदाता सूची से हट जाने की तमाम शिकायतों के मद्देनजर अदालत ने कहा कि मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटना और उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त होना, दोनों अलग अलग कानूनी विषय हैं। इस मामले में शीर्ष अदालत ने साफ किया कि नागरिकता का निर्धारण केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है और चुनाव आयोग को इस संबंध में स्वयं निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। यह ऐसे नागरिकों के लिए बड़ी राहत की बात है, जिनका नाम SIR से हट गया था।

पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। इसके बाद कई प्रभावित लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केवल मतदाता सूची से नाम हटाने के आधार पर उन्हें नागरिकता संबंधी संदेह के दायरे में लाना अनुचित है। लाईव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने इस चिंता को गंभीरता से लिया और मामले की सुनवाई की । सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कि मतदान का अधिकार तथा नागरिकता दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। अदालत ने कहा कि नागरिकता पर निर्णय केवल विधिक प्रक्रिया के अनुरूप ही होगा।

इस नज़रिए से देखें तो हमारी सोच यह है कि कमीशन को अपने संवैधानिक अधिकार के तहत यह अधिकार है कि वह वोटर लिस्ट में शामिल होने की पात्रता के बारे में खुद को संतुष्ट करने के लिए नागरिकता से जुड़ी सीमित जांच करे। ऐसी जांच का मतलब सही मायनों में नागरिकता तय करना नहीं है, और इसके आधार पर की गई कोई भी कार्रवाई सिर्फ़ चुनावी नतीजों तक ही सीमित होती है।

चीफ़ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच की टिप्पणी

पश्चिम बंगाल में जैसा कि मालूम है कि विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण अभियान के दरम्यान लोगों के नाम मतदाता सूची से हट जाने की तमाम शिकायतों के मद्देनजर, मई में इससे जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की।

इन शिकायतों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई चीफ़ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने की।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाने का अर्थ यह नहीं है कि वह भारतीय नागरिक नहीं रहा।

अदालत ने कहा कि मतदाता सूची केवल मतदान के अधिकार से जुड़ा दस्तावेज है, जबकि नागरिकता का प्रश्न संविधान और नागरिकता कानूनों के अधीन तय होता है।

न्यायालय ने दोहराया कि किसी भी व्यक्ति को नागरिकता से वंचित करने के लिए विधिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

अदालत ने कहा कि नागरिकता से जुड़े मामलों में अंतिम निर्णय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

वोटर लिस्ट से हटने वाले लोगों के लिए उम्मीद की राह

देखा जाए तो नागरिकता को लेकर जो देश के लोगों में भ्रम था सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से बहुत हद तक दूर हो गई होगी। यह उन लाखों लोगों के लिए राहत की बात मानी जा रही है जिनके नाम किसी कारणवश मतदाता सूची से हट जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया स्पष्ट हो गया कि केवल निर्वाचन सूची में नाम न होने से किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता प्रभावित नहीं होती। इससे नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा को बल मिलेगा। ऐसा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की भूमिकाओं की एक अच्छी व्याख्या भी सामने आई है। जिसकी वजह से यहआदेश भविष्य के नागरिकता विवादों में महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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