विशेष जज ने रद्द किया मजिस्ट्रेट का आदेश: सोनिया गांधी वोटर‑लिस्ट केस में प्रक्रिया संबंधी कई त्रुटियाँ
राउज एवेन्यू की विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने 2025 के मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को निरस्त कर इसे पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया, जहाँ उन्होंने शिकायत में संज्ञेय अपराध के अस्तित्व, तथ्य‑कानून की पर्याप्त जाँच और बीएनएसएस धारा 175(3) के पालन न होने जैसी प्रक्रियात्मक चूकों को उजागर किया। अदालत ने कहा कि पुलिस की दलीलों को नहीं सुना गया, थाने से रिपोर्ट नहीं मांगी गई और दो संभावित कानूनी विकल्पों पर विचार नहीं किया गया, जिससे नया आदेश जारी करने की आवश्यकता है।

सौजन्य से:- Hindustan
सोनिया गांधी वोटर लिस्ट केस: मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कहां-कहां की गलतियां? अदालत ने गिनाया
दिल्ली की एक विशेष अदालत ने सोनिया गांधी का नागरिकता से पहले वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने के आरोपों की जांच खारिज करने वाला मजिस्ट्रेट कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया है। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कहां-कहां की गलतियां?
निखिल पाठक, नई दिल्ली
सोनिया गांधी के भारतीय नागरिक बनने से पहले वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने के आरोप से जुड़े मामले में कानूनी चुनौती बरकरार रहेगी। राउज एवेन्यू स्थित विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने की अदालत ने सोमवार को सोनिया गांधी का भारतीय नागरिकता मिलने से पहले वोटर लिस्ट में नाम शामिल किए जाने के आरोप की जांच से इनकार करने वाले मजिस्ट्रेट कोर्ट के साल 2025 के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कहां-कहां गलतियां की हैं इसको भी बताया है। इस रिपोर्ट में उन कमियों पर एक नजर...
अपराध बनता है या नहीं, नहीं की चर्चा
स्पेशल जज विशाल गोगने की अदालत ने मामले को वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट में भेजते हुए शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई करने और कानून के अनुसार कारणों के साथ आदेश पारित करने का निर्देश दिया। अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश में कमियां गिनाते हुए कहा कि निचली अदालत के आदेश में इस बात पर उचित चर्चा नहीं की गई कि शिकायत में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है या नहीं।
तथ्यों और कानून पर नहीं किया विचार
विशेष अदालत ने यह भी कहा कि आदेश में तथ्यों और कानून पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। यह मामला राउज एवेन्यू कोर्ट की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की ओर से दाखिल शिकायत से जुड़ा है।
क्या धोखाधड़ी का अपराध था? देखना जरूरी
विशेष न्यायाधीश ने कहा कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता संसदीय लोकतंत्र में हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची में छेड़छाड़, किसी व्यक्ति का फर्जी तरीके से नाम शामिल करने, गैर-नागरिक का नाम जोड़ने या गलत घोषणा अथवा दस्तावेजों के इस्तेमाल जैसे आरोपों पर यह देखना जरूरी है कि क्या धोखाधड़ी या जालसाजी का संज्ञेय अपराध बनता है।
BNSS की धारा 175(3) की प्रक्रिया का नहीं किया पालन
अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(3) के तहत जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। इस धारा के तहत मजिस्ट्रेट संज्ञेय अपराध की जांच के लिए पुलिस को निर्देश दे सकता है।
पुलिस अधिकारी को नहीं सुना, थाने से रिपोर्ट भी नहीं मंगाई
कोर्ट के मुताबिक संबंधित पुलिस अधिकारी की दलीलें नहीं सुनी गईं और संबंधित थाने से स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं मंगाई गई।
सामने थे दो कानूनी विकल्प, दोनों पर नहीं किया गौर
अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने दो कानूनी विकल्प थे। पहला, प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देना और दूसरा, बीएनएसएस की धारा 223 के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान लेकर आगे की कार्यवाही करना। लेकिन इन दोनों विकल्पों पर उचित विचार नहीं किया गया।
क्या पुलिस जांच की जरूरत थी? करना था विचार
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को इस स्तर पर केवल यह देखना था कि शिकायत में कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है या नहीं और क्या पुलिस जांच की जरूरत है?
नागरिकता के मुद्दे पर की चर्चा
इसके बजाय आदेश में नागरिकता के मुद्दे पर चर्चा की गई, जो केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा विषय है।
EC के पास शक्ति का मतलब यह नहीं की पुलिस जांच नहीं होगी
अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की शक्तियां होने का मतलब यह नहीं है कि पुलिस को मतदाता सूची में कथित फर्जी तरीके से नाम शामिल करने या गलत दस्तावेजों के इस्तेमाल की जांच करने से रोका जा सकता है।
संज्ञेय अपराध के खुलासे पर विचार ही नहीं किया
विशेष अदालत ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट ने अपने मूल दायित्व के तहत शिकायत में संज्ञेय अपराध के खुलासे पर विचार नहीं किया। इसी आधार पर पुराने आदेश को रद्द कर मामला वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट भेज दिया गया।
गांधी के खिलाफ ये आरोप
राउज एवेन्यू कोर्ट की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की ओर से दाखिल शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सोनिया गांधी का नाम नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में वर्ष 1980 में शामिल किया गया था, जबकि उन्होंने भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को हासिल की थी।
1982 में सूची से हटा, 1983 में दोबारा शामिल किया
शिकायत में कहा गया है कि उनका नाम वर्ष 1982 में सूची से हटा दिया गया और फिर 1983 में दोबारा शामिल किया गया। आरोप है कि दोबारा नाम शामिल किया जाना भी नागरिकता हासिल करने से पहले हुआ था।
क्या कहा था मजिस्ट्रेट कोर्ट ने..?
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पहले शिकायत खारिज करते हुए कहा था कि इसमें धोखाधड़ी और जालसाजी के जरूरी तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। अदालत ने वर्ष 1980 की मतदाता सूची के जिस अंश पर भरोसा किया गया था, उसे भी बिना प्रमाणित कॉपी की फोटोकॉपी बताया था। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
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