सुप्रीम कोर्ट के विशाखा फैसले ने कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न को दिया कानूनी सुरक्षा
1992 में राजस्थान में भंवरी देवी के साथ हुए बलात्कार के बाद, विशाखा केस के रूप में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के मौलिक अधिकारों के तहत कार्यस्थल यौन उत्पीड़न के लिए बाध्यकारी दिशानिर्देश जारी किए। इन दिशानिर्देशों ने नियोक्ताओं की जिम्मेदारी तय की और अंततः 2013 में यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम का आधार बना।

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com
विखाखा केस का मामला क्या था?
दरअसल इस केस का नाम राजस्थान के एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) के नाम पर रखा गया है जो राजस्थान में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करता है। एक महिला भंवरी देवी, इसमें सामुदायिक कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही थीं और दहेज विरोधी और बाल विवाह अभियानों के बारे में जागरूकता बढ़ाती थीं। साल 1992 में, राजस्थान के एक गांव में एक परिवार में बाल विवाह रोकने पर वहां के प्रभावशाली लोगों द्वारा उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। केस होने पर शुरुआत में, साक्ष्य के अभाव में स्थानीय अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया गया। फिर भंवरी देवी और अन्य ने विशाखा मंच के तहत भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की।सुप्रीम कोर्ट में याचिका, कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न का अहम मुद्दा
- राजस्थान में हुई इस घटना ने काम के दौरान महिलाओं की सुरक्षा और राज्य की जिम्मेदारी से जुड़े गंभीर सवाल खड़े किए। भंवरी देवी की घटना की पृष्ठभूमि में एनजीओ विशाखा सहित कुछ और महिला संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की।
- दायर जनहित याचिका, जिसमें कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न का मसला सबसे खास था, सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सुनवाई की। इसमें तब के मुख्य न्यायाधीश वर्मा, न्यायमूर्ति सुजाता वी. मनोहर और न्यायमूर्ति बी.एन. कृपाल शामिल थे।
- सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लैंगिक समानता और महिलाओं की गरिमा से जुड़े मौलिक अधिकारों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा भी शामिल है। फैसले में अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(g) और 21 से जुड़े संवैधानिक संरक्षण को महत्वपूर्ण माना गया।
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि लैंगिक असंतुलन स्वयं महिलाओं के विरुद्ध हिंसा (कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न और बलात्कार के रूप में) के रूप में समाज में विद्यमान है। अदालत ने कहा कि मामले को निष्पक्षता से निपटाने के लिए दिशानिर्देशों की आवश्यकता है। विशाखा मामले के दिशानिर्देश कानूनी रूप से बाध्यकारी थे।
- इसके बाद केंद्र सरकार दिशानिर्देश तैयार करने और एक नीति लाने पर सहमत हुई, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि महिलाओं के अधिकारों का सम्मान किया जाए और उन्हें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित वातावरण मिले।
नियोक्ताओं के लिए भी जिम्मेदारी तय हुई?
ऐसे मामलों में शीर्ष अदालत ने कहा कि नियोक्ता और जिम्मेदार संस्थानों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। शिकायतों के लिए प्रभावी तंत्र और उचित उफचार उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया। किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा उत्पीड़न होने की स्थिति में भी नियोक्ता या प्रभारी व्यक्ति से प्रभावित महिला को आवश्यक सहायता और निवारक कार्रवाई सुनिश्चित करने की बात भी कही गई।विशाखा केस के दिशा-निर्देशों के बाद बना कानून
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ही साफ कर दिया था कि उसके दिशानिर्देश तब तक बाध्यकारी रहेंगे, जब तक इस विषय पर उपयुक्त कानून नहीं बन जाता। कोर्ट ने इन्हें संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए जारी किया और अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून के रूप में माना। इस तरह 1997 से संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक विशाखा केस के दिशा-निर्देश ही कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए प्रमुख कानूनी ढांचा बनी रहीं।मुसलमान UCC का विरोध क्यों करते हैं? मुस्लिम Personal Law और समान नागरिक संहिता की कानूनी बहस समझिए
सुप्रीम कोर्ट के विशाखा केस के ऐतिहासिक फैसले की उपलब्धियां
- सबसे पहली और बड़ी बात कि सुप्रीम कोर्ट के विशाखा केस के फैसले ने ही पहली बार भारत में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को विस्तार से परिभाषित किया और इसके खिलाफ एक स्पष्ट न्यायिक फ्रेमवर्क तैयार किया और नियोक्ता की भी जिम्मेदारियां तय कीं।
- इसके बाद इसी फैसले और दिशानिर्देशों के तहत संसद ने कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013 बनाया, जो 9 दिसंबर 2013 से पूरे देश में लागू हुआ।
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