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सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर का निर्णय और केस सुनवाई का क्रम कैसे तय होता है

मुख्य न्यायाधीश ही सुप्रीम कोर्ट में बेंचों और मामलों के रोस्टर निर्धारित करते हैं, जो कंप्यूटर‑आधारित प्रणाली से स्वचालित रूप से बंटते हैं। संवेदनशील या विशेष मामलों में सीजेआई सीधे किसी जज या बेंच को सौंप सकते हैं। नोएडा डीएम मामले में बेंच बदलने और आउट‑ऑफ‑टर्न लिस्टिंग पर वकीलों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाया है।

27 सितंबर 2026 को 08:04 am बजे
सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर का निर्णय और केस सुनवाई का क्रम कैसे तय होता है

सौजन्य से:- abplive.com

कौन बनाता है सुप्रीम कोर्ट का रोस्टर, कैसे तय होती है मामलों की सुनवाई?

सुप्रीम कोर्ट में रोस्टर और पीठ का गठन केवल मुख्य न्यायाधीश करते हैं. नोएडा डीएम मामले की सुनवाई के दौरान आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग और वीसी बंद करने के आरोपों ने रोस्टर व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है.

नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम से जुड़े एक प्रशासनिक मामले की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद जजों की बेंच और मामलों की लिस्टिंग को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. अधिवक्ताओं के संगठन लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने एक ही दिन में हुई दो अलग-अलग सुनवाइयों की प्रक्रिया और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का एक्सेस बंद किए जाने पर सवाल उठाए हैं. इस विवाद के सामने आने के बाद आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर देश की सबसे बड़ी अदालत में मुकदमों की सुनवाई की दिशा कौन तय करता है, रोस्टर बनाने का कानूनी नियम क्या है और मुख्य न्यायाधीश की भूमिका इस पूरी व्यवस्था में किस तरह काम करती है. चलिए समझें.

अदालत में रोस्टर तय करने का अधिकार किसके पास है?

देश की सर्वोच्च अदालत में मुकदमों की सुनवाई के लिए किस जज की कौन सी बेंच बनेगी, यह फैसला केवल भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ही करते हैं. न्यायशास्त्र की भाषा में मुख्य न्यायाधीश को ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर' कहा जाता है. सर्वोच्च अदालत के कई ऐतिहासिक फैसलों, जैसे कि शांति भूषण मामले में, यह बिल्कुल साफ किया जा चुका है कि पीठों का गठन करने और जजों को अलग-अलग श्रेणी के मुकदमे सौंपने का अंतिम और विशेषाधिकार केवल सीजेआई के पास ही सुरक्षित रहता है.

मुकदमों के बंटवारे की डिजिटल और पारदर्शी व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट में आने वाले मुकदमों को उनकी प्रकृति के हिसाब से कई अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है, जैसे आपराधिक मामले, टैक्स से जुड़े विवाद, पारिवारिक कानून या जनहित याचिकाएं. मुकदमों को संबंधित जजों की पीठ के पास भेजने के लिए एक स्वचालित कंप्यूटरीकृत प्रणाली का इस्तेमाल किया जाता है. इस आधुनिक व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वकीलों को सामान्य मुकदमों को जल्दी लिस्ट कराने के लिए जजों के सामने बार-बार विशेष अनुरोध या मेंशनिंग करने की जरूरत नहीं पड़ती है.

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विशेष मामलों में मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार

कंप्यूटर आधारित पारदर्शी व्यवस्था होने के बावजूद, अगर कोई मामला बहुत संवेदनशील या असाधारण प्रकृति का होता है, तो मुख्य न्यायाधीश अपने प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं. सीजेआई अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए किसी भी अति-महत्वपूर्ण याचिका को किसी खास जज या विशेष बेंच के पास सीधे सुनवाई के लिए भेज सकते हैं. इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी और समय-समय पर बदले जाने वाले रोस्टर का ब्योरा आम जनता के लिए सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपडेट किया जाता है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला और उस पर स्टे

विवाद की शुरुआत नोएडा डीएम मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों से जुड़े एक मामले से हुई. दरअसल, इस साल अप्रैल में नोएडा में हुए एक श्रमिक आंदोलन के दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी को एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस गिरफ्तारी को गैर-कानूनी बताते हुए अधिकारियों के वेतन से छात्रा को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने हाई कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों और मुआवजे के आदेश पर रोक लगा दी, हालांकि एनएसए से जुड़ा हाई कोर्ट का बाकी आदेश बरकरार रखा.

सुनवाई की प्रक्रिया पर वकीलों के संगठन की आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ज्यादा चर्चा सुनवाई के तरीके को लेकर हो रही है. लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन का आरोप है कि बेंच बदलकर और तय क्रम से बाहर जाकर (आउट-ऑफ-टर्न) मामले की अर्जेंट सुनवाई की गई. संगठन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर शिकायत की है कि अदालत की सुनवाई सार्वजनिक होती है, लेकिन इस महत्वपूर्ण मामले के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का एक्सेस अचानक बंद कर दिया गया. वकीलों के मुताबिक किसी खास पक्ष को इस तरह की विशेष सुविधा दिया जाना न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन है और यह जनता के भरोसे से जुड़ा गंभीर मुद्दा है.

यह भी पढ़ें: CEC ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे दें तो क्या होगा, उनकी गैर-मौजूदगी में कौन देखेगा काम?

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