भ्रष्टाचार की जड़ें तक पहुंचें: मद्रास उच्च न्यायालय ने सरकार से जांच समय सीमा के अंदर पूरा कराने का आदेश दिया।
मद्रास उच्च न्यायालय ने सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई में देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और जांच समय सीमा के अंदर पूरा करने का आदेश दिया है। अदालत ने सरकार से एक स्वतंत्र और पूर्णकालिक विजिलेंस आयुक्त नियुक्त करने के लिए कहा है।

सौजन्य से:- Jansatta
मद्रास हाई कोर्ट ने उन सराकारी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई में लंबे समय से हो रही देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अदालत ने कहा कि ऐसी निष्क्रियता राज्य की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करती है।
हाई कोर्ट ने ढांचागत सुधारों की जरूरतों पर जोर देते हुए तमिलनाडु सरकार से एक स्वतंत्र और पूर्णकालिक विजिलेंस आयुक्त नियुक्त करने का आग्रह किया। साथ ही कोर्ट ने अनुशासनात्मक न्यायाधिकरणों को निर्देश दिया कि वे वर्षों से लंबित जांचों का एक तय समयसीमा के अंदर पूरा करें।
जस्टिस बी. पगलेंधी कई रिट याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई कर रहे थे। जिनमें विभिन्न ट्रिब्यूनलों के समक्ष लंबित विभागीय कार्यवाहियां और राज्य सरकार द्वारा जांच पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मांगने से जुड़ी अर्जियाँ शामिल थीं।
अदालत ने 29 जून के अपने आदेश में कहा, “हर सरकार यह दावा करती है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत रही है। भ्रष्टाचार हर जगह गहराई तक फैला हुआ है, जिसे केवल समर्पित और निरंतर कार्रवाई से खत्म किया जा सकता है। यह तभी संभव है जब सतर्कता आयोग और सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक विभाग को मजबूत किया जाए।”
यह संयुक्त आदेश कई सरकारी कर्मचारियों द्वारा दायर याचिकाओं पर आधारित था। इनमें सहायक अभियंता सी. अकीला सहित कई कर्मचारी शामिल थे, जिन्होंने शिकायत की थी कि विभागीय जाँच वर्षों से लंबित है, जबकि सरकार द्वारा इसके लिए निर्धारित समय-सीमाएं तय हैं। इससे उनकी पदोन्नति, वरिष्ठता और अन्य सेवा लाभों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
जांच समय सीमा के अंदर पूरी हो- कोर्ट
अदालत ने कहा कि तमिलनाडु सिविल सेवा (अनुशासनात्मक कार्यवाही न्यायाधिकरण) नियम, 1955 के तहत बनाए गए ट्रिब्यूनल उन सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच के लिए गठित किए गए हैं, जिन पर भ्रष्टाचार विरोधी निदेशालय (डीवीएसी) द्वारा जांच के बाद भ्रष्टाचार के आरोप होते हैं।
न्यायमूर्ति पुगलेंधी ने पाया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी करने के लिए सरकार द्वारा बार-बार सख्त समयसीमा निर्धारित करने के निर्देशों के बावजूद, जांच अक्सर वर्षों तक खिंचती रहती है। 4 अगस्त, 2022 के एक सरकारी आदेश के अनुसार, सतर्कता जांच एक वर्ष के भीतर पूरी की जानी है, न्यायाधिकरणों से अपेक्षा की जाती है कि वे एक और वर्ष के भीतर जांच पूरी करें और सरकार को चार महीने के भीतर अंतिम आदेश पारित करना होगा। हालांकि, अदालत के समक्ष प्रस्तुत मामलों से पता चलता है कि इन समयसीमाओं का शायद ही कभी पालन किया जाता है।
170 मामले लंबित
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पूरे तमिलनाडु में विभिन्न ट्रिब्यूनलों के समक्ष कुल 170 अनुशासनात्मक मामले लंबित हैं। जिनमें- 52 मामले 1 वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं। 49 मामले 2 वर्ष से ज्यादा। 34 मामले 3 वर्ष से ज्यादा। 8 मामले 4 वर्ष से ज्यादा। 27 मामले 5 वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं कोर्ट ने कहा कि ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि पुराने मामलों को प्राथमिकता देने और प्रक्रिया में तेजी लाने की तत्काल जरूरत है, क्योंकि लगातार देरी से भ्रष्टाचार-रोधी व्यवस्था का उद्देश्य ही कमजोर हो रहा है।
एक दशक से ज्यादा समय से जांच लंबित
अदालत के समक्ष दायर प्रमुख याचिकाओं में से एक सहायक अभियंता सी. अकिला द्वारा दायर की गई थी, जिनके खिलाफ 2015 में अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी। इस आरोप के बाद कि इंदिरा आवास योजना के तहत 6.75 लाख रुपये की सरकारी धनराशि का 2008-09 और 2010-11 के दौरान कथित तौर पर ऐसे घरों के निर्माण को दर्शाने वाले जाली रिकॉर्ड बनाकर दुरुपयोग किया गया था जो कभी बनाए ही नहीं गए थे।
अकिला ने इससे पहले जुलाई 2025 में हाई कोर्ट से एक निर्देश प्राप्त किया था, जिसमें न्यायाधिकरण को चार महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया था। कार्यवाही अधूरी रहने के कारण, राज्य ने और समय मांगा जबकि अकिला ने पदोन्नति पद के आरक्षण, आरोप पत्र को रद्द करने और लंबी देरी के लिए मुआवजे की मांग करते हुए नए याचिकाएं दायर कीं, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि लंबित जांच ने उनके करियर की प्रगति को रोक दिया है।
हालांकि, अदालत ने केवल देरी के कारण अनुशासनात्मक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया। यह देखते हुए कि भ्रष्टाचार के आरोपों पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय आवश्यक है। इसके बजाय, अदालत ने न्यायाधिकरण को बिना किसी और विस्तार की मांग किए तीन महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया।
पदोन्नति और सेवा लाभ प्रभावित
उच्च न्यायालय ने पाया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही के लंबे समय तक चलने से सरकारी कर्मचारियों पर सीधा प्रभाव पड़ता है , जिससे पदोन्नति में देरी होती है, वरिष्ठता प्रभावित होती है और उन्हें अन्य सेवा लाभों से वंचित होना पड़ता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि लंबी कार्यवाही के दौरान निलंबित रखे गए अधिकारियों को निर्वाह भत्ता मिलता रहता है, इसलिए प्रशासनिक दक्षता और जनहित दोनों ही दृष्टियों से जांच का शीघ्र समापन आवश्यक है ।
अदालत ने आगे कहा कि सतर्कता निरीक्षण के दौरान अधिकारियों से अस्पष्ट नकदी की बरामदगी जैसे अपेक्षाकृत सीधे-सादे आरोपों से जुड़े मामलों को भी आमतौर पर सरकार के अपने दिशानिर्देशों के तहत निर्धारित समय के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
अदालत ने अधिक मजबूत सतर्कता ढांचा अपनाने की मांग
न्यायमूर्ति पुगलेंधी ने कहा कि अनुशासनात्मक न्यायाधिकरणों के कामकाज की देखरेख करने वाले सतर्कता आयुक्त को जांच की प्रगति की सक्रिय रूप से निगरानी करनी चाहिए। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गवाहों को समय पर पेश किया जाए और यह देखना चाहिए कि अभियोजक नियमित रूप से न्यायाधिकरणों के समक्ष उपस्थित हों।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यद्यपि भ्रष्टाचार निवारण पर संथानम समिति की सिफारिशों के बाद 1965 में राज्य सतर्कता आयोग की स्थापना की गई थी, लेकिन तमिलनाडु में वर्तमान में सतर्कता प्रशासन के लिए विशेष रूप से समर्पित कोई नियमित या स्थायी सतर्कता आयुक्त नहीं है।इसके बजाय, इस जिम्मेदारी को एक अन्य विभाग के प्रमुख वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अतिरिक्त प्रभार के रूप में संभाला जा रहा है।
अदालत के अनुसार, यदि राज्य वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त शासन प्राप्त करना चाहता है, तो सतर्कता मामलों की देखरेख के लिए समर्पित एक स्वतंत्र सतर्कता आयुक्त आवश्यक है। इसमें आगे यह भी कहा गया कि अनुशासनात्मक न्यायाधिकरणों की अध्यक्षता नियमों के अनुसार जिला न्यायाधीश के रैंक के न्यायिक अधिकारियों द्वारा या वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए ।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
हाई कोर्ट ने राम सिंह बनाम सीबीआई (2000) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें भ्रष्टाचार को एक ऐसी बीमारी बताया गया था, जिसे अगर अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो लोकतांत्रिक संस्थाओं और कानून के शासन को नष्ट कर सकती है। भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों को प्राथमिकता दिए जाने पर जोर देते हुए न्यायालय ने कहा कि लंबे समय तक लंबित रहने से न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर होता है।
निर्देश जारी
राज्य की अर्जी को सीमित हद तक ही स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने अकिला और एक अन्य अधिकारी, एम. रथिनम के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी करने के लिए तीन महीने का समय दिया, और यह स्पष्ट कर दिया कि आगे कोई विस्तार नहीं मांगा जाना चाहिए। न्यायालय ने संबंधित अनुशासनात्मक न्यायाधिकरणों को आदेश प्राप्त होने की तिथि से चार महीने के भीतर शेष संबंधित मामलों में कार्यवाही पूरी करने का भी निर्देश दिया।
फैसले का महत्व
इस फैसले से यह बात स्पष्ट होती है कि भ्रष्टाचार से संबंधित अनुशासनात्मक कार्यवाही में देरी न केवल जवाबदेही को कमजोर करती है, बल्कि सार्वजनिक प्रशासन और सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को भी नुकसान पहुंचाती है। मद्रास उच्च न्यायालय ने एक समर्पित सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति की मांग करते हुए और वैधानिक समय-सीमाओं का कड़ाई से पालन करने पर जोर देते हुए व्यवस्थागत सुधारों का आह्वान किया है, ताकि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और निपटारा अनावश्यक देरी के बिना हो सके।
6 से 8 साल के बीच की तीन बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में पॉक्सो अदालत द्वारा दोषी कारार दिए गए शख्स की मौत की सजा को मद्रास हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा है कि अभियोजन पक्ष ने अपने इस मामले को संदेह से परे साबित कर दिया है और बच्चों के खिलाफ अपराध को हत्या से भी अधिक जघन्य अपराध बताया गया है। पढ़ें पूरी खबर।
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