चुनाव आयोग ने टीएमसी का नाम‑चिह्न फ्रीज़ किया, ममता बनर्जी समेत दोनों गुटों को वैकल्पिक पहचान देनी होगी
चुनाव आयोग ने नंदीग्राम और रेजीनगर के उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न प्रयोग करने से रोक दिया और उन्हें शुक्रवार सुबह 11 बजे तक अपने-अपने वैकल्पिक नाम व प्रतीक प्रस्तुत करने को कहा। आदेश में कहा गया कि ममता बनर्जी और अरूप राय (रितब्रत) के नेतृत्व वाले दोनों समूहों को अब टीएमसी के मूल पहचान का उपयोग नहीं मिलेगा, बल्कि उन्हें अलग‑अलग नाम व प्रतीक अपनाना होगा।

सौजन्य से:- BBC
टीएमसी और उसका चुनाव चिह्न फ़िलहाल हुआ फ़्रीज़, ममता भी नहीं कर पाएंगी इस्तेमाल, जानिए पूरा फ़ैसला
चुनाव आयोग ने गुरुवार को जारी एक अंतरिम आदेश में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र में होने वाले उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों को पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने पर रोक लगा दी.
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विधानसभा में मौजूदा नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुटों से कहा कि वे शुक्रवार सुबह 11 बजे तक उपचुनाव के लिए अपने-अपने गुटों के वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न के प्रस्ताव जमा करें.
कांग्रेस ने कहा कि चुनाव आयोग का यह क़दम भारतीय लोकतंत्र के दिल में गोली दागने की तरह है.
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, "चुनाव आयोग ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह बीजेपी के हाथों की कठपुतली के अलावा कुछ नहीं है. चुनाव आयोग लोकतंत्र को धीरे-धीरे ख़त्म करने का एक औजार बन गया. उसने शिवसेना, एनसीपी और अब टीएमसी के मामले में भी यही किया है. जो भी बीजेपी का विरोध करता है, उस पर घातक वार किया जाता है और उसका पूरा चुनावी अस्तित्व छीन लिया जाता है."
चुनाव आयोग के इस फ़ैसले पर 'बैटलग्राउंड बंगाल' के लेखक और कोलकाता के ज़ेवियर कॉलेज में पत्रकारिता के अध्यापक सायंतन घोष ने लिखा है, ''मेरे विचार में निर्वाचन आयोग की ओर से टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज किया जाना पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं था.''
''संगठन से जुड़े ऐसे विवादों में आयोग पहले भी इसी तरह का रुख़ अपनाता रहा है. बड़ा मुद्दा यह है कि इस स्तर पर आयोग ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को टीएमसी के रूप में मान्यता देने से इनकार किया है, जबकि ममता बनर्जी पार्टी की संस्थापक-अध्यक्ष हैं.''
''यह ममता की टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका है. हो सकता है कि उन्हें इसकी आशंका रही हो, लेकिन जिस पार्टी की स्थापना उन्होंने ख़ुद की, उसकी पहचान और चुनाव चिह्न खोना बंगाल के लिए एक असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम है. यह तथ्य कि जिसने पार्टी बनाई उसे ही मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, बंगाल के चुनावी इतिहास में ये अभूतपूर्व है.''
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग का यह आदेश गुरुवार को दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों की निर्वाचन आयोग के सामने हुई सुनवाई के बाद आया. पाँच दिनों से भी कम समय में यह दूसरी सुनवाई थी. निर्वाचन आयोग ने इससे पहले 12 सितंबर को भी दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया था. रितब्रत गुट से कुछ अतिरिक्त दस्तावेज़ भी जमा करने को कहा गया था.
दोनों विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव छह अक्तूबर को होने वाले हैं. दोनों गुटों ने तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर उपचुनाव के लिए अपने उम्मीदवार उतारे हैं. इसके बाद चुनाव आयोग में निर्णायक सुनवाई शुरू हुई.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, अपने 14 पन्नों के आदेश में निर्वाचन आयोग ने कहा कि आयोग के पास उपलब्ध सभी सूचनाओं पर समग्र रूप से विचार करने के बाद उसकी राय है कि तृणमूल कांग्रेस में दो प्रतिद्वंद्वी गुट हैं. इनमें से एक का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं और दूसरे का नेतृत्व अरूप रॉय (रितब्रत गुट) कर रहे हैं. दोनों गुट अब ख़ुद को पार्टी बता रहे हैं. इसलिए चुनाव चिह्न (रिज़र्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 के पैरा 15 के तहत इस मामले में उचित फ़ैसले की ज़रूरत है.
चुनाव आयोग ने कहा कि आदेश दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को समान स्थिति में रखने और उनके अधिकारों के साथ हितों की रक्षा के लिए दिया गया है.
आदेश में कहा गया, "अरूप रॉय (याचिकाकर्ता) और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुटों में से किसी एक को भी टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होगी. दोनों गुटों की पहचान उन नामों से होगी, जिन्हें वे अपने-अपने गुट के लिए चुनेंगे. अगर वे चाहें, तो अपने मूल दल टीएमसी से संबंध का उल्लेख भी अपने नाम में कर सकते हैं. दोनों गुटों को मौजूदा उपचुनावों के लिए निर्वाचन आयोग की ओर से अधिसूचित चुनाव चिह्नों की सूची में से अपनी पसंद के अलग-अलग चुनाव चिह्न भी आवंटित किए जाएंगे."
चुनाव आयोग में सुनवाई के बाद ममता बनर्जी गुट के सांसद कल्याण बनर्जी ने पत्रकारों से कहा था, ''हमने कहा है कि कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए. सुनवाई क़रीब डेढ़ घंटे तक चली. पार्टी की असली संस्थापक और जन्मदाता ममता बनर्जी हैं. कोई नया व्यक्ति आकर पार्टी का जनक होने का दावा नहीं कर सकता.''
''पार्टी का संविधान और चुनाव प्रक्रिया बूथ और ब्लॉक से शुरू होती है, जिसे ताक पर रखकर कोई मनगढ़ंत दस्तावेज़ तैयार नहीं किया जा सकता. रितब्रत बनर्जी की दुर्भावना यह है कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष नहीं चुना गया, इसलिए उन्होंने पूरा खेल रचा है. यही वह व्यक्ति हैं, जो 2023 में पार्टी में शामिल हुए थे. वह पार्टी के मूल सदस्य नहीं थे. वह पार्टी को अपने क़ब्ज़े में लेने की कोशिश कर रहे हैं."
कल्याण बनर्जी ने कहा, ''सिविल कोर्ट के अंतरिम आदेशों को सीधे तौर पर चुनाव आयोग एकतरफ़ा लागू नहीं कर सकता. चुनाव आयोग को स्वतंत्र रूप से यह तय करना होगा कि असली पार्टी और उसका चुनाव चिह्न किसके पास रहेगा.''
निर्वाचन आयोग के साथ बैठक में अरूप रॉय गुट की ओर से पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी शामिल हुए. बैठक के बाद रितब्रत बनर्जी ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, ''हम तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और हमने फॉर्म ए जमा किया है.''
''अब प्रक्रिया निर्वाचन आयोग और रिटर्निंग ऑफिसर के पास है. संभावना है कि रिटर्निंग ऑफिसर आयोग से सलाह के बाद फ़ैसला करेंगे. निर्वाचन आयोग सर्वोच्च संस्था है और हमें उस पर भरोसा रखना चाहिए. हम संसदीय लोकतंत्र में काम करते हैं, इसलिए हमें निर्वाचन आयोग पर विश्वास करना होगा."
चुनाव आयोग ने किस आधार पर लिया फ़ैसला
टीएमसी में विभाजन की स्थिति मई में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के तुरंत बाद सामने आई. तीन जून को तृणमूल कांग्रेस के 80 में से क़रीब 60 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. रितब्रत को नेता प्रतिपक्ष चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से इसकी मान्यता भी हासिल कर ली. बाद में बाग़ी गुट ने अरूप रॉय को पार्टी का अध्यक्ष घोषित कर दिया.
ममता के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 भी पार्टी से अलग हो गए और एक अनजान सी नेशनलिस्ट सिटिज़न पार्टी ऑफ़ इंडिया में विलय कर लिया.
गुरुवार को अपने अंतरिम आदेश में निर्वाचन आयोग ने कहा कि ममता ने 23 जून को आयोग को बताया था कि 20 जून को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक हुई थी और पदाधिकारियों के साथ राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्यों के नाम घोषित किए गए थे.
रितब्रत ने 23 जून को आयोग से कहा था कि राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल 11 फ़रवरी, 2025 को समाप्त हो गया था और इसके बाद उसे फ़ैसले लेने का अधिकार नहीं रह गया था. उन्होंने कहा कि 22 जून को पार्टी का विशेष अधिवेशन बुलाया गया, जिसमें अरूप रॉय को सर्वसम्मति से पार्टी का अध्यक्ष चुना गया.
ममता का कहना है कि पार्टी का संविधान इस साल 9 मार्च को निर्वाचन आयोग के पास जमा किया गया था और उसमें पार्टी के पदाधिकारियों का कार्यकाल पांच साल बताया गया है. उन्होंने कहा है कि पिछला चुनाव 2022 में हुआ था, इसलिए पदाधिकारियों का कार्यकाल 2027 तक वैध है.
पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज करने का निर्वाचन आयोग का फ़ैसला हाल के शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में हुए विभाजन के मामलों में अपनाई गई मिसाल के अनुरूप है.
दोनों मामलों में विवाद का समाधान होने तक निर्वाचन आयोग ने पार्टियों के नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज कर दिए थे और बाद में दोनों मामलों में इन्हें बाग़ी गुटों को आवंटित कर दिया था.
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