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अधिकारियों ने कहा, लोक अदालत की सुलह केवल औपचारिक नहीं – इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा के आदेश को रद्द किया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सुलह प्रक्रिया में पक्षकारों के बीच वास्तविक और ईमानदार प्रयास आवश्यक हैं, केवल कागजी औपचारिकता नहीं। इस आधार पर न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने मथुरा स्थायी लोक अदालत के 21 अप्रैल के आदेश को निरस्त कर मामले को पुनः सुनवाई के लिये भेजा।

6 अक्टूबर 2026 को 08:05 pm बजे
अधिकारियों ने कहा, लोक अदालत की सुलह केवल औपचारिक नहीं – इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मथुरा के आदेश को रद्द किया

सौजन्य से:- Jagran

'लोक अदालत की सुलह प्रक्रिया महज औपचारिकता नहीं', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद किया मथुरा स्थायी लोक अदालत का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लोक अदालत की सुलह प्रक्रिया को महज औपचारिकता मानने से इनकार किया, कहा कि इसमें वास्तविक ...और पढ़ें

HighLights

- लोक अदालत की सुलह प्रक्रिया महज औपचारिकता नहीं।

- समझौते के लिए वास्तविक और ईमानदार प्रयास आवश्यक।

- मथुरा स्थायी लोक अदालत का आदेश रद्द किया गया।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लोक अदालत की सुलह प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह केवल औपचारिकता नहीं है, जिसे यंत्रवत पूरा कर दिया जाए। पत्रावली से स्पष्ट होना चाहिए कि पक्षकारों के बीच समझौते की शर्तें तय कराने के लिए वास्तविक और ईमानदार प्रयास किया गया। केवल यह लिख देना कि समाधान का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली, पर्याप्त नहीं है।

इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने मथुरा की स्थायी लोक अदालत का 21 अप्रैल का आदेश रद कर दिया और प्रकरण नए सिरे से तय करने के लिए वापस भेज दिया।

कोर्ट ने यह आदेश दि ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड व अन्य की दिनेश कुमार गर्ग व अन्य के विरुद्ध दाखिल याचिका पर दिया। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि स्थायी लोक अदालत ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम की धारा 22-सी के तहत निर्धारित सुलह प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया।

लोक अदालत के आदेश में दर्ज था कि विपक्षियों ने 22 मार्च 2024 को जवाब दाखिल किया और मामला 18 से 30 अप्रैल 2024 तक सुलह वार्ता के लिए नियत होता रहा। इसके बाद केवल यह कहते हुए कि काफी प्रयास के बावजूद सुलह सफल नहीं हुई, शपथपत्रीय साक्ष्य लेकर विवाद का गुण-दोष के आधार पर निस्तारण कर दिया गया।

हाई कोर्ट ने इस विवरण को कानूनी रूप से अपर्याप्त माना। पीठ ने कहा कि स्थायी लोक अदालत का पहला दायित्व पक्षकारों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता कराने का वास्तविक प्रयास करना है। इसमें विफल रहने के बाद ही वह विवाद का गुण-दोष के आधार पर निर्णय कर सकती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुलह के दौरान किए गए प्रयासों का संक्षिप्त विवरण आदेश में दर्ज होना चाहिए। ऐसा न होने पर माना जा सकता है कि विधि के अनुरूप सुलह का प्रयास नहीं किया गया और ऐसी कार्यवाही कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं होगी।

ज्ञानवापी वुजुखाना सर्वे की मांग वाली याचिका पर सुनवाई स्थगित

हाई कोर्ट ने वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद स्थित वुजुखाना क्षेत्र के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) से वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराने से संबंधित पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई स्थगित कर दी है। सर्वेक्षण उस ढांचे को छोड़कर किए जाने की मांग है, जिसे मंदिर पक्ष ‘शिवलिंग’ और मस्जिद पक्ष ‘फव्वारा’ मानता है। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 30 नवंबर की तारीख निर्धारित की है।

विधान सभा और पंचायत चुनाव की मतदाता सूची में अंतर पर हाई कोर्ट ने मांगा जवाब

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने रायबरेली की मखदूमपुर ग्राम पंचायत में विधान सभा और पंचायत चुनाव के लिए तैयार मतदाता सूचियों में अंतर के मामले में केंद्रीय निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। न्यायालय ने दोनों पक्षों को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।

यह आदेश न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने मखदूमपुर ग्राम पंचायत निवासी रोहित की याचिका पर दिया। याची की ओर से दलील दी गयी थी कि ग्राम पंचायत चुनाव के लिए तैयार मतदाता सूची और विधान सभा चुनाव की मतदाता सूची में 468 मतदाताओं का अंतर है। पंचायत चुनाव की मतदाता सूची में जहां 1987 मतदाता दर्ज हैं, वहीं विधान सभा चुनाव की सूची में केवल 1519 मतदाता हैं।

सुनवाई के दौरान केंद्रीय निर्वाचन आयोग की ओर से बताया गया कि दोनों चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने के मानक अलग-अलग हैं। विधान सभा चुनाव की मतदाता सूची में ऐसे व्यक्ति का नाम हटाया जा सकता है, जो संबंधित विधान सभा क्षेत्र में तीन या अधिक वर्षों से निवास नहीं कर रहा हो। न्यायालय ने दोनों निर्वाचन आयोगों से इस संबंध में विस्तृत जवाब मांगा है।

देवरिया के शिक्षक ने की थी खुदकुशी, तत्कालीन बीएसए शालिनी को हुई जेल

हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी रद कर दी, लेकिन तीन शिक्षकों की सेवा का मामला विभागीय फाइलों में अटका रहा। 20 माह तक चले इंतजार के बीच विभागीय घूसखोरी से आहत सहायक अध्यापक कृष्णमोहन सिंह ने आत्महत्या कर ली। सात माह बाद अब जाकर तीनों मामलों पर फैसला हो सका। शिक्षक अपर्णा तिवारी और ओंकार सिंह, बहाल होंगे और कृष्णमोहन की पत्नी को मृतक आश्रित कोटे में नौकरी देने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

पांच अक्टूबर को बीएसए डा. राम जियावन मौर्य ने इसके आदेश जारी किए। मंगलवार को इसकी प्रति शिक्षक की पत्नी गुड़िया सिंह को मिली तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। कृषक लघु माध्यमिक विद्यालय मदरसन, गौरीबाजार के सहायक अध्यापक कृष्णमोहन सिंह की मृत्यु से पूर्व तक का अवरुद्ध वेतन उनके आश्रित के बैंक खाते में भुगतान कराने के लिए संस्था प्रबंधक को नियमानुसार बिल प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

उनकी पत्नी गुड़िया सिंह को मृतक आश्रित के रूप में नियुक्ति देने के लिए सुस्पष्ट प्रस्ताव भी मांगा गया है। सहायक अध्यापिका अपर्णा तिवारी और सहायक अध्यापक ओंकार सिंह को सेवा समाप्ति की तिथि से बहाल कर दिया गया है। दोनों के अवरुद्ध वेतन के भुगतान के लिए नियमानुसार देयक वित्त एवं लेखाधिकारी, बेसिक शिक्षा को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

अध्यापक कृष्ण मोहन सिंह ने 21 फरवरी 2026 को गोरखपुर स्थित अपने आवास पर आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने वीडियो संदेश और चार पन्नों के सुसाइड नोट में आरोप लगाया था कि कोर्ट के आदेश के बावजूद उनकी नियुक्ति बहाल करने और वेतन जारी करने के एवज में बेसिक शिक्षा विभाग के क्लर्क संजीव सिंह और तत्कालीन बेसिक शिक्षा अधिकारी शालिनी श्रीवास्तव द्वारा ₹10 से ₹16 लाख तक की रिश्वत मांगी जा रही थी।

शासन ने आरोपित अधिकारियों को निलंबित कर दिया। इस मामले में महीनों तक फरार रहने और ₹25,000 का इनाम घोषित होने के बाद, मुख्य आरोपी निलंबित बीएसए शालिनी श्रीवास्तव को जून में दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया गया।

आंधी तूफान से नुकसान पर कारोबारी को 12.70 लाख मुआवजे का निर्देश बरकरार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस कंपनी की याचिका खारिज करते हुए गोरखपुर की स्थायी लोक अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें आंधी-तूफान से हुए नुकसान के लिए कारोबारी को 12.70 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने दिया है।

मेसर्स अजय ट्रेडर्स ने 17 मार्च, 2021 को कंपनी से स्टैंडर्ड फायर एंड स्पेशल पेरिल्स पालिसी ली थी। आंधी, बारिश और ओलावृष्टि से 9-10 मई, 2021 की रात गोदाम की एस्बेस्टस छत टूट गई और रखा सनमाइका-प्लाईवुड बर्बाद हो गया। कंपनी ने यह कहकर क्लेम खारिज कर दिया कि शीट ठीक से नहीं लगी थीं और पानी का रिसाव बीमित जोखिम नहीं है।

कंपनी के अधिवक्ता ने दलील दी कि लोक अदालत ने सुलह की कार्यवाही नहीं की, नुकसान पूरी तरह आंधी से नहीं हुआ और पालिसी निर्माण इकाई के लिए थी, जबकि परिसर गोदाम के रूप में उपयोग हो रहा था। कोर्ट ने माना कि लोक अदालत की सुलह प्रक्रिया पर टिप्पणी संतोषजनक नहीं थी, लेकिन दोनों पक्षों की मौजूदगी में गुण-दोष के आधार पर सुनवाई की गई। कहा कि पालिसी कंपनी के निरीक्षण के बाद जारी हुई थी और तब कोई आपत्ति नहीं थी।

घटना पालिसी के दो माह के भीतर हुई, इसलिए शीट ढीली होने की दलील स्वीकार्य नहीं है। तेज आंधी-बारिश में शीट टिकना मुश्किल था और यह रिसाव नहीं, तूफान से नुकसान का मामला है, जो पालिसी में कवर है। सर्वेयर ने कुल नुकसान 28.33 लाख आंका था, जिसमें सैल्वेज, अंडर-इंश्योरेंस और पांच प्रतिशत एक्सेस क्लाज की कटौती के बाद 12,70,340 रुपये तय हुए। इस पर 20 सितंबर, 2021 से ब्याज भी देय है।

विवेचक की सफाई सुन हाई कोर्ट ने एनबीडब्ल्यू किया रद, एसएसपी को हाजिर होने का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आजमगढ़ के महाराजगंज थाने के एक मामले में विवेचक विनय कुमार मिश्रा के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट उनकी सफाई सुनने के बाद रद कर दिया है। साथ ही एसएसपी, थानाध्यक्ष और एसएसपी कार्यालय के पीआरओ को 12 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने सचिन यादव की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया है।

एफआइआर के मुताबिक पीड़िता की शादी आवेदक से तय हुई थी, जो टूट गई। आरोप है कि आवेदक ने वीडियो काल पर पीड़िता का अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया और इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित कर दिया। तीन सितंबर को सुनवाई में आवेदक के अधिवक्ता ने दलील दी कि उसके मोबाइल फोन से कोई अश्लील वीडियो बरामद नहीं हुआ और राज्य के हलफनामे में लगे स्क्रीनशाट में सामग्री राकेश नामक व्यक्ति ने भेजी थी। कोर्ट ने पाया कि हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं था कि राकेश कौन है और वीडियो किसने अपलोड किया?

अपर शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि मोबाइल फोन एफएसएल भेजा गया है, रिपोर्ट नहीं आई और केस डायरी में आइपी एड्रेस का विवरण नहीं है। इस पर कोर्ट ने विवेचक को रिकार्ड के साथ हाजिर होकर जांच में कमी बताने के लिए कहा। विवेचक 16 सितंबर को हाजिर नहीं हुए और उनकी जगह सब इंस्पेक्टर अशोक कुमार सिंह को भेज दिया गया। बिना छूट अर्जी के गैरहाजिरी को अवमाननापूर्ण मानते हुए कोर्ट ने विवेचक के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया।

विवेचक 29 सितंबर को हाजिर और बताया कि 20 जुलाई को उनका तबादला यूपीपीसीएल विजिलेंस विंग में हो चुका था और एसएसपी कार्यालय या थानाध्यक्ष ने उन्हें सूचना नहीं दी। कोर्ट ने स्पष्टीकरण से संतुष्ट होकर वारंट वापस ले लिया और अगली पेशी तक छूट दे दी। विवेचक ने बताया कि राकेश यादव नाम की फेसबुक आइडी खुद आवेदक ने बनाई थी और सिम भी उसके नाम था।

कोर्ट ने एजीए को पेन ड्राइव पेश करने को कहा, जिसमें इसी आइडी से अपलोड वीडियो है। एजीए अनुराग पांडेय ने बताया कि एसएसपी के पीआरओ ने फोन पर उनसे दुर्व्यवहार किया और अनपढ़ कहा। इस पर कोर्ट ने पीआरओ को भी पेश होने को कहा है।

हत्या के 40 साल पुराने मामले में अभियुक्त बरी, हाई कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हत्या के 40 साल पुराने मामले में अभियुक्त इम्तियाज को संदेह का लाभ देते हुए अपराध से बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल मृतक को पकड़ने की भूमिका के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के तहत हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन को साझा मंशा, पूर्व नियोजित योजना अथवा अभियुक्तों के बीच पहले से हुई सहमति का ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक है।

यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने इम्तियाज की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए दिया है। मामला बुलंदशहर के सिकंदराबाद थाने में वर्ष 1986 में दर्ज हुआ था। अभियोजन के अनुसार, 16 मार्च 1986 को जंगशेर अपने भाई दलशेर के साथ बाजार जा रहा था। रास्ते में इम्तियाज और उसके भाई फारूक मिले।

आरोप था कि इम्तियाज ने जंगशेर को पकड़ लिया और फारूक ने उसकी पीठ में चाकू मार दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। ट्रायल कोर्ट ने इम्तियाज को धारा 302/34 और फारूक को धारा 302 आइपीसी के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दो-दो हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। अपील लंबित रहने के दौरान फारूक की मृत्यु हो गई और उसके संबंध में अपील समाप्त हो गई।

कोर्ट ने कहा कि रिकार्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि इम्तियाज और फारूक के बीच हत्या के लिए पहले से कोई योजना, आपसी सहमति या साझा मंशा थी। सुप्रीम कोर्ट के कृष्ण गोविंद पाटिल बनाम महाराष्ट्र राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 34 के तहत दोषसिद्धि के लिए साझा मंशा और पूर्व सहमति का होना आवश्यक है। कोर्ट ने इम्तियाज के जेल में बंद होने की स्थिति में उसे तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी जरूरत न हो।

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