इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से 30‑दिन की जमानत पर स्पष्टीकरण मांगने का आदेश
हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को केवल 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत देने वाले ट्रायल कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाया। कोर्ट ने बताया कि ऐसे कम समय के लिए सुरक्षा देने का कोई कारण आदेश में नहीं बताया गया, जिससे आरोपी को बार‑बार जमानत के लिए अर्जी देनी पड़ सकती है। ट्रायल कोर्ट से 30‑दिन की सीमा तय करने के आधार और भविष्य की प्रक्रियाओं पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा गया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
सिर्फ 30 दिन की अग्रिम जमानत क्यों? हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को महज 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत देने के आदेश पर उठाया सवाल.
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : September 25, 2026 at 8:17 AM IST
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तीन आरोपियों को महज 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत देने के ट्रायल कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए संबंधित पीठासीन अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा है. कोर्ट ने कहा कि इतने कम समय के लिए सुरक्षा देने का कोई स्पष्ट कारण आदेश में दर्ज नहीं किया गया.
यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने सुरेश यादव व दो अन्य की याचिका पर सुनवाई पर दिया है. याचिका में आजमगढ़ की अपर जिला जज प्रथम के 23 दिसंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है. ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों की अग्रिम जमानत मंजूर तो की लेकिन उनकी गिरफ्तारी से सुरक्षा सिर्फ 30 दिनों तक सीमित की. आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि इतनी कम अवधि के लिए सुरक्षा देने का कोई औचित्य नहीं है.
खासतौर पर इसलिए कि जांच के दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार नहीं किया और चार्जशीट दाखिल होने तक भी उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई. यह भी बताया कि जिन अपराधों का आरोप लगाया गया, उनमें अधिकतम सजा सात साल से कम है. उन्होंने बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत जारी नोटिस का भी पालन किया था. आरोपियों ने सुशीला अग्रवाल बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सामान्य तौर पर अग्रिम जमानत उचित शर्तों के साथ मुकदमे की समाप्ति तक जारी रह सकती है.
हाईकोर्ट ने इससे पहले आरोपियों को अंतरिम सुरक्षा देते हुए ट्रायल कोर्ट से रिपोर्ट मांगी थी कि अग्रिम जमानत को केवल 30 दिनों तक सीमित करने का आधार क्या है? कोर्ट ने कहा कि इस मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी थी और ट्रायल कोर्ट संज्ञान भी ले चुकी था. इसके बावजूद अग्रिम जमानत मंजूर करते समय पीठासीन अधिकारी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सुरक्षा केवल 30 दिनों के लिए ही क्यों दी जा रही है.
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आदेश का परिणाम यह हो सकता है कि 30 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपी को फिर से जमानत के लिए प्रार्थना पत्र देना पड़े. कोर्ट ने इसे अनावश्यक उत्पीड़न की स्थिति बताया. संबंधित ट्रायल कोर्ट ने तीन सितंबर को अपना स्पष्टीकरण दाखिल किया लेकिन हाईकोर्ट उससे संतुष्ट नहीं हुआ.
अब हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को तीन बिंदुओं पर उचित स्पष्टीकरण दाखिल करने का निर्देश दिया. ट्रायल कोर्ट से पूछा गया कि उन्होंने कितने मामलों में आरोपियों को 20, 30 या 40 दिनों जैसी सीमित अवधि के लिए जमानत दी है. कोर्ट ने यह भी पूछा कि इस मामले में ऐसी कौन सी विशेष परिस्थितियां हैं, जिनके आधार पर आरोपियों को केवल 30 दिनों की अग्रिम जमानत देना उचित समझा गया जबकि उक्त अपराधों में अधिकतम सजा सात साल से कम थी और चार्जशीट दाखिल होने तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया.
हाईकोर्ट ने तीसरा सवाल यह रखा कि 30 दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपियों से क्या अपेक्षा थी. क्या उन्हें ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर दोबारा अग्रिम जमानत की अर्जी देना है. हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि अदालत अग्रिम जमानत की अर्जी पर विचार करते समय या तो उचित शर्तों के साथ मुकदमे के निष्कर्ष तक सुरक्षा दे सकती है या अपराध की गंभीरता समेत प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अर्जी खारिज कर सकती है। हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों को दी गई अंतरिम सुरक्षा आगे भी जारी रखने का निर्देश दिया.
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