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नए आपराधिक संहिताओं के साथ न्याय का 3‑साल का लक्ष्य, FIR से सुप्रीम कोर्ट तक प्रक्रिया तेज़

1 जुलाई 2024 से भारत में IPC, CrPC और Indian Evidence Act को तीन नई विधाओं – BNS, BNSS और BSA – से बदल दिया गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इन संहिता की पूरी कार्यान्वयन के बाद FIR से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक केस को तीन साल के भीतर निपटाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें जांच, चार्जशीट, ट्रायल और अपील के लिए स्पष्ट समय सीमाएँ निर्धारित की गई हैं।

4 अक्टूबर 2026 को 05:04 am बजे
नए आपराधिक संहिताओं के साथ न्याय का 3‑साल का लक्ष्य, FIR से सुप्रीम कोर्ट तक प्रक्रिया तेज़

सौजन्य से:- Navbharat Times

देश में न्याय की गति धीमी है। इस सिलसिले में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि नए आपराधिक कानून BNS 2023 के पूरी तरह लागू होने के बाद FIR से लेकर Supreme Court तक न्याय की प्रक्रिया तीन साल के भीतर पूरी करने का लक्ष्य है।

नई दिल्ली : भारत में 1 जुलाई 2024 से कानूनी परिदृश्य पूरा बदल गया। IPC, CrPC और Indian Evidence Act की जगह तीन नए आपराधिक कानून लागू किए गए। इनमें भारतीय न्याय संहिता Bharatiya Nyaya Sanhita ( BNS 2023 ), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनयम Bharatiya Sakshya Adhiniyam (BSA) शामिल हैं। अब केंद्र सरकार का जोर इन कानूनों को पुलिस, अभियोजन, फॉरेंसिक और अदालतों की पूरी व्यवस्था से जोड़कर मुकदमों की गति बढ़ाने पर है। गृह मंत्री अमित शाह ने शनिवार को भोपाल में नए आपराधिक कानून पर प्रदर्शनी में कहा कि पूरी व्यवस्था लागू होने के बाद FIR से Supreme Court तक केस तीन साल में निपटाने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

अमित शाह ने कहा है कि नए कानूनों की पूरी तरह से लागू व्यवस्था में FIR से Supreme Court तक न्याय की प्रक्रिया तीन साल में पूरी करने का लक्ष्य है। हालांकि यह बात किसी एक BNS धारा में लिखी हुई ऐसी गारंटी नहीं है कि हर आपराधिक केस अनिवार्य रूप से तीन साल में सुप्रीम कोर्ट तक खत्म हो जाएगा। दरअसल यह यह सरकार की व्यापक न्यायिक सुधार योजना है, जिसमें पुलिस जांच, अभियोजन, ट्रायल और अपील की प्रक्रिया को तेज करना शामिल है।

BNS अकेले नहीं, तीन कानूनों की त्रिशक्ति करेगी काम

BNS 2023 मुख्य रूप से अपराध और उनकी सजा से जुड़े प्रावधानों वाला कानून है। जबकि BNSS आपराधिक मामलों की प्रक्रिया से जुड़ा कानून है, जिसमें FIR, जांच, गिरफ्तारी, ट्रायल और फैसले की प्रक्रिया शामिल है। और BSA में सबूत से जुड़े नियम हैं और इसमें इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल रिकॉर्ड को भी कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता दी गई है। इसलिए तेज न्याय की पूरी तस्वीर समझने के लिए केवल BNS नहीं, बल्कि BNS, BNSS और BSA तीनों की ताकत को साथ देखना जरूरी है। ऐसे में अदालतों के साथ मिलकर लंबित मामलों को कम करने के लिए व्यवस्था तैयार की जा रही है।

जीरो एफआईआर' (Zero FIR) एक ऐसा अधिकार है जिसके तहत अपराध चाहे किसी भी क्षेत्र में हुआ हो, आप देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। जीरो FIR दर्ज करने के बाद, संबंधित पुलिस स्टेशन शुरुआती कार्रवाई (जैसे जरूरत पड़ने पर पीड़िता का तुरंत मेडिकल टेस्ट कराना) करता है और फिर केस की डायरी व जरूरी कागजात उस थाने को ट्रांसफर कर देता है जिसके अधिकार क्षेत्र में वह अपराध हुआ है।

क्या होता है Zero FIR ?

FIR और जांच में क्या बदलाव आया?

नई व्यवस्था में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अपराध की सूचना देने और Zero FIR जैसी सुविधाओं पर जोर दिया गया है। BNSS के तहत जांच की प्रगति की जानकारी शिकायतकर्ता या पीड़ित को 90 दिनों के भीतर देने का प्रावधान है। सरकार ने जांच और आगे की प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों के लिए भी समयसीमा तय की है, ताकि केस अनिश्चित समय तक लंबित न रहे।

चार्जशीट और ट्रायल में समयसीमा क्यों महत्वपूर्ण है?

गृह मंत्रालय के अनुसार शुरुआती जांच को 14 दिन, दस्तावेज देने को 14 दिन और कुछ मामलों में विशेष जांच को 90 दिन की समयसीमा से जोड़ा गया है। आरोप तय करने के लिए 60 दिन और फैसला सुनाने के लिए 45 दिन जैसी समयसीमाएं भी बताई गई हैं। इसका उद्देश्य यह है कि जांच पूरी होने के बाद भी केस केवल प्रक्रियागत देरी के कारण लंबे समय तक अदालत में न अटका रहे।

फॉरेंसिक और डिजिटल सबूत पर क्यों है जोर?

मामलों में तेजी आए, इसके लिए गंभीर अपराधों में फॉरेंसिक जांच की भूमिका बढ़ाई गई है और सरकार ने पुलिस, फॉरेंसिक लैब तथा डिजिटल सिस्टम को आपस में जोड़ने पर जोर दिया है। BSA के तहत इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड को केवल डिजिटल होने के आधार पर अस्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि कानून में उसकी स्वीकार्यता के लिए अलग प्रावधान हैं। इससे CCTV, मोबाइल डेटा और दूसरे डिजिटल रिकॉर्ड जैसे सबूतों को अदालत में इस्तेमाल करने की प्रक्रिया को आधुनिक कानूनी ढांचे से जोड़ा गया है।

दरअसल, सरकार ने शुरु से ही यह तय किया है कि नए आपराधिक कानूनों का मकसद केवल अपराध की सजा बदलना नहीं, बल्कि FIR से लेकर अदालत के फैसले तक पूरी प्रक्रिया को तेज और तकनीक आधारित बनाना है। ऐसे में अमित शाह का तीन साल में FIR से Supreme Court तक न्याय का बयान इसी व्यापक सुधार लक्ष्य को सामने रखता है। लेकिन यह बात भी गौर करने वाली है इस मामले में कि आने वाले समय में इस लक्ष्य की वास्तविक सफलता पुलिस जांच की गुणवत्ता, फॉरेंसिक क्षमता, अभियोजन और अदालतों में लंबित मामलों को कम करने पर ही निर्भर करेगी, न कि बड़े बड़े दावों पर।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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