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सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवा की कीमत को नरसंहार कहा, 2,700 की दवा पर 27,000 का MRP

कोर्ट ने दवाओं की विविध कीमतों और 16% मार्जिन सीमा न तय करने पर सवाल उठाते हुए कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया, जिसकी वास्तविक कीमत ₹2,700 थी पर MRP ₹27,000 था, जिसे वह नरसंहार कहता है। यह उच्च कीमत सरकारी योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों पर टैक्सपेयर का बोझ बनती है, जबकि पिछले तीन सालों में देश में कैंसर‑रोधी दवाओं का कारोबार ₹5,281 crore तक बढ़ा है।

29 सितंबर 2026 को 02:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवा की कीमत को नरसंहार कहा, 2,700 की दवा पर 27,000 का MRP

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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कैंसर दवाओं की कीमत पर सुप्रीम कोर्ट बोला- यह नरसंहार:₹2700 की दवा पर कीमत ₹27 हजार कैसे; देश में हर साल ₹5,381 करोड़ का दवा कारोबार

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दवाओं की कीमतों पर नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि दवाओं के लिए अलग-अलग नियम क्यों हैं। इन पर अधिकतम 16% मार्जिन की सीमा क्यों नहीं तय की जा सकती।

कोर्ट ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया, जिसकी रिटेल कीमत करीब ₹2,700 थी, लेकिन MRP ₹27 हजार थी। कोर्ट ने कहा- यह नरसंहार है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दवाओं की कीमत, जेनेरिक दवाओं की प्रिस्क्रिप्शन और मेडिकल डिवाइस के कंट्रोल से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की।

सरकार के फार्मास्यूटिकल्स विभाग की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में भारत में कैंसर-रोधी दवाओं की सालाना बिक्री ₹5,281 करोड़ रही। 2021-22 में यह ₹3,382 करोड़ थी। यानी तीन साल में बिक्री करीब 56% बढ़ी। इस कैटेगरी की बिक्री 2021-22 से 2024-25 के बीच 16.01% सालाना की दर से बढ़ी।

कोर्ट रूम LIVE

- सुप्रीम कोर्ट: यदि मरीज सरकारी योजना में इलाज करा रहा है तो इतनी बढ़ी कीमत का भुगतान कौन करता है। इसका बोझ सरकारी खजाने और टैक्सपेयर्स पर ही पड़ता है।

- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता: यह गंभीर मुद्दा है। ऐसा समाधान जरूरी है, जिसमें मरीजों, सरकार और फार्मा कंपनियों सभी के हितों का संतुलन रहे।

- मेहता: फार्मा कंपनियां लाभ कमाने वाली नहीं हैं। ऐसा लगता है कि लाभ कमाने वाले निजी अस्पताल हैं।

- सुप्रीम कोर्ट: प्राइवेट हॉस्पिटल इंडस्ट्री की तरह काम कर रहे हैं। वे मरीजों को अपनी फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं।

- याचिकाकर्ता: जिन दवाओं की कीमत सरकार तय करती है, उनका बाजार में हिस्सा कम है। वहीं, जिनकी कीमत सरकार की तरफ से तय नहीं की गई है, उनका बाजार में करीब 80% या उससे ज्यादा हिस्सा है। उनकी शुरुआती MRP तय करने में कंपनियों को ज्यादा छूट मिलती है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे दवाओं की कीमत और मरीजों के इलाज का खर्च बढ़ सकता है। कई मरीज इलाज के लिए अपनी संपत्ति या गहने तक बेचने को मजबूर होते हैं।

DPCO 2013 के तहत दवा की कीमत तय करने की प्रक्रिया

ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) का मकसद जरूरी दवाओं की कीमत नियंत्रित रखना है, ताकि कंपनियां मनमानी कीमत न वसूल सकें।

DPCO 2013 के तहत नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) में शामिल जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत सरकार तय करती है। इसके लिए बाजार में बिक रही दवाओं की औसत कीमत के आधार पर सीलिंग प्राइस (अधिकतम सीमा) तय की जाती है। इस कीमत से ज्यादा पर दवा बेचना गैरकानूनी है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति दवाओं की सुरक्षा, असर और कीमत को देखते हुए जरूरी दवाओं का चयन करती है। इसमें देश में आम बीमारियों और लोगों की स्वास्थ्य जरूरतों का भी ध्यान रखा जाता है।

इस लिस्ट की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और जरूरत के अनुसार नई दवाएं जोड़ी जाती हैं। जो दवाएं इस सूची में नहीं होतीं, उनकी कीमतों पर सरकार का सीधा नियंत्रण कम होता है।

नोट- यहां गैर-आवश्यक का मतलब बेकार दवा नहीं है, बल्कि ऐसी दवा है जो NLEM में शामिल नहीं है।

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