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27 साल की लड़ाई के बाद एससी/एसटी केस में सभी आरोपी बरी

जिला न्यायालय ने 1999 में दर्ज एससी/एसटी एक्ट संबंधी मामले में 27 साल तक चली कानूनी जद्दोजहद के बाद सभी आरोपियों को बरी कर दिया। फैसला सुनाए जाने से पहले एक आरोपी का निधन हो चुका था, जबकि अभियोजन पक्ष ने कोई गवाह पेश नहीं किया। अदालत ने केस की लम्बी देरी को तेज़ न्याय के अधिकार का उल्लंघन मानते हुए रिहाई का आदेश दिया।

1 अक्टूबर 2026 को 01:05 pm बजे
27 साल की लड़ाई के बाद एससी/एसटी केस में सभी आरोपी बरी

सौजन्य से:- Amar Ujala

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अदालत : एससी/एसटी के मामले में 27 साल चली कानूनी लड़ाई, सभी आरोपी बरी

Thu, 01 Oct 2026 04:22 PM IST

विनोद सिंह

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

Published by: विनोद सिंह

Updated Thu, 01 Oct 2026 04:22 PM IST

सार

जिला न्यायालय ने एससी/एसटी एक्ट सहित अन्य मामलों में 27 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद सभी आरोपियों को बरी कर दिया है, लेकिन फैसला आने से पहले एक आरोपी गुड्डू उर्फ रामनरेश दम तोड़ चुका था।

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विस्तार

जिला न्यायालय ने एससी/एसटी एक्ट सहित अन्य मामलों में 27 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद सभी आरोपियों को बरी कर दिया है, लेकिन फैसला आने से पहले एक आरोपी गुड्डू उर्फ रामनरेश दम तोड़ चुका था। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर निवासी वादी बेनीराम ने बहरिया थाने में जून 1999 को एससी/एसटी एक्ट सहित विभिन्न आरोप में एफआईआर दर्ज कराई थी।

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आरोप था कि ईंट भट्ठा मालिक और उसके साथियों ने 15 मजदूरों की मजदूरी रोकी, गालीगलौज की और बंधुआ मजदूर बनाकर काम कराया। मामले में फूलचंद्र, पप्पू, रामखेलावन और गुड्डू को आरोपी बनाया गया था।अपर सत्र न्यायाधीश परवेज अख्तर की अदालत ने पाया कि आरोप तय होने के बाद 17 साल से ज्यादा समय बीतने के बावजूद अभियोजन पक्ष एक भी गवाह पेश नहीं कर सका।

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पुलिस की ओर से भेजे गए समन पर पता चला कि दर्ज पतों पर न तो कोई गवाह मिला और न ही वादी बेनीराम का कोई सुराग लगा। इस पर न्यायालय ने कहा कि प्राथमिकी या पुलिस की चार्जशीट के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने माना कि आरोपियों को अदालत के चक्कर काटने पर मजबूर करना और केस को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना त्वरित न्याय के मौलिक अधिकार का सीधा हनन है। इसी के साथ जीवित बचे तीन आरोपियों फूलचंद्र, पप्पू व रामखेलावन को दोषमुक्त कर दिया है।

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