अंधेरे में तीर चलाने के लिए ऊपरी अदालत में आती है सरकार, क्लास फोर कर्मी के हक में फैसला देते हुए राज्य सरकार पर 25 हजार जुर्माना
अंधेरे में तीर चलाने के लिए ऊपरी अदालत में आती है सरकार, क्लास फोर कर्मी के हक में फैसला देते हुए राज्य सरकार पर 25 हजार जुर्माना हिमाचल हाईकोर्ट ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के हक में फैसला सुनाते हुए सरकार की अपील को 25,0…

सौजन्य से:- etvbharat.com
अंधेरे में तीर चलाने के लिए ऊपरी अदालत में आती है सरकार, क्लास फोर कर्मी के हक में फैसला देते हुए राज्य सरकार पर 25 हजार जुर्माना
हिमाचल हाईकोर्ट ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के हक में फैसला सुनाते हुए सरकार की अपील को 25,000 के अनुकरणीय जुर्माने के साथ खारिज किया.
By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 19, 2026 at 10:19 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने क्लास फोर कर्मचारी से जुड़े एक मामले में राज्य सरकार पर कड़ी टिप्पणियां की हैं. हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया व न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सरकार के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि पहले से तय कवर्ड मामलों में भी बार-बार अपील की जा रही है. खंडपीठ ने कहा कि अंधेरे में तीर चलाने के लिए सरकार ऊपरी अदालत का रुख करती है. सरकार अदालती मामलों में ढुलमुल नीति अपनाती है.
इन कड़ी टिप्पणियों के साथ ही अदालत ने सरकार पर 25 हजार का जुर्माना भी लगाया. बार-बार अपील दाखिल करने की सरकारी प्रवृत्ति पर भी अदालत ने सख्ती दिखाई. मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली खंडपीठ ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के हक में फैसला सुनाते हुए सरकार की अपील को 25,000 के अनुकरणीय जुर्माने के साथ खारिज कर दिया है.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सरकार के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य एक मॉडल एम्प्लॉयर यानी आदर्श नियोक्ता है, इतना होने के बावजूद उन मामलों में भी अपीलें दायर की जा रही हैं, जो कानूनी रूप से पहले ही तय हो चुके हैं. खंडपीठ ने कहा कि सरकार केवल ऑफ-बीट चांस यानी अंधेरे में तीर चलाने के लिए ऊपरी अदालतों का रुख करती है. इससे न केवल अदालत का कीमती समय बर्बाद होता है, बल्कि साधनहीन क्लास फोर यानी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का भी मानसिक और वित्तीय उत्पीड़न होता है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित विभागों को नींद से जगाने के लिए यह जुर्माना लगाना बेहद जरूरी हो गया था.
मामले के अनुसार प्रतिवादी राम गोपाल को वर्ष 1993 में वन विभाग के तहत इंटीग्रेटेड वॉटरशेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में दैनिक वेतन भोगी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया गया था. एकल पीठ ने 21 नवंबर 2025 को राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि याचिकाकर्ता को 8 साल की निरंतर सेवा पूरी करने के बाद 1 जनवरी 2001 से नियमित करते हुए वर्क-चार्ज स्टेटस का लाभ दिया जाए.
सरकार ने एकल पीठ के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट तक खारिज हो चुके संत राम मामले के आधार पर कवर्ड होने के बावजूद खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी. सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि कर्मचारी को साल 2001 में यह अधिकार मिला था, लेकिन वह 23 साल की देरी के बाद 2024 में अदालत आया. इसलिए याचिका खारिज होनी चाहिए.
राज्य सरकार की इस दलील को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने खुद 9 अक्टूबर 2012 को नियमितीकरण की नीति जारी की थी, जिसके लाभ पात्र कर्मचारियों तक पहुंचाना सरकार की अपनी जिम्मेदारी थी. कर्मचारी लंबे समय से चल रही अदालती प्रक्रियाओं जैसे संत राम केस के अंतिम फैसले का इंतजार कर रहा था, इसलिए उसकी देरी पूरी तरह तर्कसंगत है.
ये भी पढ़ें: अनुबंध कर्मियों को संशोधित पे-स्केल से जुड़ा मामला, घनश्याम एंड अदर्स की याचिका में एकल पीठ के फैसले पर रोक
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