सुप्रीम कोर्ट ने यूपी हिरासत मौत मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में 2009 में मौत के बाद दिव्यांग नाहर सिंह के परिवार के अधिकारों की सुनवाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी है।

सौजन्य से:- Live Law Hindi
सुप्रीम कोर्ट ने 2009 के यूपी हिरासत मौत मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही पर लगाई रोक
Praveen Mishra
21 July 2026 1:20 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश में वर्ष 2009 में दिव्यांग व्यक्ति नाहर सिंह की कथित हिरासत में मौत से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार और तत्कालीन एसएसपी अजय कुमार मिश्रा की ओर से दायर अपील पर नोटिस जारी करते हुए आदेश दिया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका (PIL) संख्या 16563/2010 की आगे की सुनवाई फिलहाल स्थगित रहेगी।
यह मामला वर्ष 2009 में मैनपुरी जिले के दन्नाहार थाने की लॉकअप में 40 प्रतिशत दिव्यांग नाहर सिंह की मौत से जुड़ा है। इस संबंध में एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स (AALI) ने जनहित याचिका दायर की थी।
इससे पहले, इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने 16 मई के आदेश में उत्तर प्रदेश पुलिस और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की कड़ी आलोचना की थी। अदालत ने इसे "संस्थागत विफलता" करार देते हुए कहा था कि 16 वर्ष पुराने इस मामले को जिस तरह बंद किया गया, वह गंभीर चिंता का विषय है।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से NHRC की आलोचना करते हुए कहा था कि आयोग ने स्वतंत्र जांच किए बिना पुलिस के संस्करण को ही सही मानकर मामला बंद कर दिया। अदालत ने यह भी नाराजगी जताई थी कि घटना स्थल की वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी और पोस्टमार्टम से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य 16 वर्षों बाद भी उपलब्ध नहीं कराए गए।
इसी कारण हाईकोर्ट ने सीबीआई को 60 दिनों के भीतर लापता वीडियो साक्ष्य खोजकर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था और मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त के लिए तय की थी।
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि पुलिस का दावा था कि नाहर सिंह ने लॉकअप के शौचालय में अपनी चमड़े की बेल्ट से फांसी लगाकर आत्महत्या की, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बेल्ट के बकल का निशान नहीं बल्कि 'गांठ का निशान' (knot mark) और श्वासनली (trachea) की हड्डियों के टूटने का उल्लेख था, जो अदालत के अनुसार फांसी की तुलना में गला घोंटे जाने (strangulation) की संभावना की ओर अधिक संकेत करता है।
हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी है और उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य अपीलकर्ताओं की याचिका पर जवाब तलब किया है।
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