बलिया वेद प्रकाश सिंह हत्याकांड पर बड़ा फैसला: हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को मिली उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलिया के वेद प्रकाश सिंह हत्याकांड में दो आरोपियों को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट ने पलट दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन के द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य विश्वसनीय नहीं थे।

सौजन्य से:- ETV Bharat
बलिया वेद प्रकाश सिंह हत्याकांड: हाईकोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला, 2 दोषियों की उम्रकैद रद्द कर किया बरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलिया के बहुचर्चित वेद प्रकाश सिंह हत्याकांड में धनुषधारी सिंह और यशवंत सिंह की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है.
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : July 15, 2026 at 9:42 PM IST
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बलिया के चर्चित वेद प्रकाश सिंह हत्याकांड में फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया और दोषी ठहराए गए धनुषधारी सिंह तथा यशवंत सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया. न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा है तथा ट्रायल कोर्ट ने अविश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि कर दी थी. मामला बलिया जिले के रसड़ा थाना क्षेत्र का है. अभियोजन के अनुसार, 13 मार्च 2008 की सुबह बीए प्रथम वर्ष की परीक्षा देने जा रहे वेद प्रकाश सिंह अपने साथियों मयंक सिंह और राहुल गुप्ता के साथ मोटरसाइकिल से जा रहे थे.
25 हजार रुपये के लेनदेन का विवाद : आरोप था कि एक दिन पहले वेद प्रकाश सिंह का मोटरसाइकिल खरीदने के लिए दिए गए 25 हजार रुपये वापस मांगने को लेकर अंकुर सिंह उर्फ शेरू सिंह से विवाद हुआ था. इसी रंजिश में अंकुर सिंह ने अपने साथियों धनुषधारी सिंह, यशवंत सिंह और अग्निवेश सिंह के साथ मिलकर बोलेरो से मोटरसाइकिल का पीछा किया और जानबूझकर टक्कर मार दी. आरोप था कि वेद प्रकाश के गिरने के बाद बोलेरो को उनके ऊपर चढ़ा दिया गया, जिससे उनकी मौत हो गई, जबकि मयंक, राहुल और चंदन गुप्ता घायल हो गए. पुलिस ने इस मामले में हत्या, हत्या के प्रयास, गाली-गलौज, धमकी और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने सहित विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया.
ट्रायल कोर्ट ने 2010 में सुनाई थी सजा: ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2010 में अंकुर सिंह, धनुषधारी सिंह और यशवंत सिंह को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जबकि अग्निवेश सिंह को बरी कर दिया था. अपील लंबित रहने के दौरान अंकुर सिंह की मृत्यु हो गई, जिससे उसके विरुद्ध अपील समाप्त हो गई. हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत चारों कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की गवाही विश्वसनीय नहीं है और घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी भी संदेहास्पद प्रतीत होती है. अदालत ने यह भी पाया कि घटना में घायल हुए मयंक सिंह, राहुल गुप्ता और चंदन गुप्ता जैसे सबसे महत्वपूर्ण गवाहों को अभियोजन ने अदालत में पेश ही नहीं किया.
विरोधाभास पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी: ऐसे प्राकृतिक और सर्वोत्तम गवाहों को छिपाने पर अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 (जी) के तहत अभियोजन के विरुद्ध प्रतिकूल अनुमान लगाने की बात कही. पीठ ने यह भी कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर बोलेरो चढ़ाए जाने या टायर के निशान जैसी कोई चिकित्सीय पुष्टि नहीं मिली, जबकि अभियोजन की पूरी कहानी इसी दावे पर आधारित थी. प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और चिकित्सीय साक्ष्य में गंभीर विरोधाभास पाए गए. अदालत ने ट्रायल कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि उसने साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण किए बिना केवल कथित प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर भरोसा कर दोषसिद्धि कर दी.
बिना ठोस सबूतों के नहीं दी जा सकती सजा: हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषसिद्धि केवल संदेहास्पद और अविश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर नहीं की जा सकती. इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का 4 जून 2010 का निर्णय निरस्त करते हुए धनुषधारी सिंह और यशवंत सिंह को बरी कर दिया. इस फैसले से लंबे समय से जेल में बंद आरोपियों को बड़ी राहत मिली है. कोर्ट के इस आदेश के बाद अब दोनों की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है.
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