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भ्रष्टाचार के मुकदमों में बेज़रूरत साक्ष्य से न्याय प्रक्रिया जटिल, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि भ्रष्टाचार के मामलों में अनावश्यक साक्ष्य न्यायिक कार्यवाही को उलझनभरा बना देते हैं। 1993 के एक मामले में आर्थिक लाभ सिद्ध न होने पर अपीलकर्ता को बरी कर दिया गया और जेल या जमानत के आदेश रद्द कर दिए गए। इस निर्णय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ड) के तहत स्पष्ट आर्थिक लाभ के प्रमाण की आवश्यकता को रेखांकित किया।

8 सितंबर 2026 को 08:31 pm बजे
भ्रष्टाचार के मुकदमों में बेज़रूरत साक्ष्य से न्याय प्रक्रिया जटिल, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सौजन्य से:- Jagran

'अत्यधिक और गैर-जरूरी साक्ष्य जटिल बनाते हैं न्याय प्रक्रिया', भ्रष्टाचार के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार के मुकदमों में अत्यधिक और अनावश्यक साक्ष्य न्याय प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। एक ...और पढ़ें

HighLights

- भ्रष्टाचार मुकदमों में अनावश्यक साक्ष्य न्याय प्रक्रिया जटिल बनाते हैं।

- सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के मामले में अपीलकर्ता को बरी किया।

- आर्थिक लाभ साबित न होने पर बरी करने का फैसला सुनाया।

पीटीआई, नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 के एक भ्रष्टाचार मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार के मुकदमों में लंबे समय तक पेंडेंसी रहने का एक बड़ा कारण अक्सर भारी-भरकम और अनावश्यक साक्ष्य पेश किया जाना है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पर्दीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए जाने वाले कई साक्ष्य मामले से हटकर और अप्रासंगिक होते हैं, जो अदालत के लिए भी भ्रमित करने वाले साबित होते हैं।

शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मई 2018 के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें अपीलकर्ता को दोषी ठहराया गया था। यह पूरा मामला असम के पशु चिकित्सा विभाग से जुड़ा था, जहां बिना दवाएं आपूर्ति किए एक फर्जी फर्म के नाम पर झूठे आरसीसी बिल प्रस्तुत करके 5,97,200 रुपये का चूना लगाने की शिकायत पर जांच शुरू हुई थी।

बाद में यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) को ट्रांसफर कर दिया गया था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) के तहत किसी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि स्पष्ट रूप से किसी आर्थिक लाभ (पेक्युनेरी एडवांटेज) की पुष्टि न हो जाए।

अदालत ने पाया कि उच्च न्यायालय ने खुद अपने फैसले में स्वीकार किया था कि इस मामले में ऐसा कोई आर्थिक लाभ साबित नहीं हुआ है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी गौर किया कि विभाग से इतनी बड़ी राशि जारी होने के बावजूद जांच एजेंसियों ने कभी भी मनी ट्रेल (पैसों के लेन-देन के मार्ग) का पता लगाने के लिए कोई गंभीर जांच नहीं की।

साक्ष्यों के अभाव और कानूनी तर्कों के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि वह हिरासत में हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए और यदि वे जमानत पर हैं, तो उनके मुचलके रद कर दिए जाएं।

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