सुप्रीम कोर्ट ने डिफ़ॉल्ट बेल और चार्जशीट दाखिल पर कानून की पुष्टि की
सर्वोच्च न्यायालय ने डिफ़ॉल्ट बेल के अधिकार पर फैसला सुनाया और कहा कि यदि जांच एजेंसी समय पर चार्जशीट दाखिल करती है, तो आरोपी को डिफ़ॉल्ट बेल का वैधानिक अधिकार नहीं मिलेगा।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने डिफ़ॉल्ट बेल संबंधी कानूनी स्थिति में सुधार लाने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि जांच एजेंसी ने कानून द्वारा निर्धारित समय-सीमा के भीतर न्यायालय में चार्जशीट (Final Report) दाखिल कर दी है, तो केवल इस आधार पर कि उसकी प्रति आरोपी को बाद में मिली या अतिरिक्त प्रतियां समय पर उपलब्ध नहीं कराई गईं, आरोपी को डिफॉल्ट बेल (Default Bail) का अधिकार प्राप्त नहीं होगा।
न्यायालय ने कहा कि डिफॉल्ट बेल का उद्देश्य जांच एजेंसी को अपनी जांच पूरी करने और निर्धारित समय के भीतर चार्जशीट दाखिल करने के लिए बाध्य करना है। यदि चार्जशीट समय-सीमा के भीतर दाखिल की गई है, तो आरोपी को मौजूदा कानून के अनुसार डिफॉल्ट बेल का वैधानिक अधिकार समाप्त हो जाता है।
यह फैसला Shaurya Sunil Kumar Singh बनाम Central Bureau of Investigation (CBI) मामले में सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपपत्र का समय पर दाखिल होना और उसकी प्रतियां उपलब्ध कराना दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इनमें से प्रथम प्रक्रिया जांच एजेंसी के लिए समय-सीमा के भीतर जांच पूरी करने की आवश्यकता से संबंधित है, जबकि द्वितीय प्रक्रिया शिकायतों की न्यायसंगत जांच और उनका विकास करने के लिए आवश्यक है।
यह निर्णय साक्ष्य-आधारित न्यायता प्रणाली की अखंडता में और अधिक स्पष्टता लाएगा। यह सुनिश्चित करेगा कि जांच एजेंसियों को समय पर जांच पूरी करने के लिए कानूनी बाध्या होगी।
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