Supreme Court: 'जज भगवान नहीं, हर फैसला सही नहीं हो सकता'; विदाई समारोह में ऐसा क्यों बोले जस्टिस संजय करोल?
Supreme Court: 'जज भगवान नहीं, हर फैसला सही नहीं हो सकता'; विदाई समारोह में ऐसा क्यों बोले जस्टिस संजय करोल? सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस संजय करोल ने विदाई संबोधन में कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं हैं और हर…

सौजन्य से:- Amar Ujala
Supreme Court: 'जज भगवान नहीं, हर फैसला सही नहीं हो सकता'; विदाई समारोह में ऐसा क्यों बोले जस्टिस संजय करोल?
सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हो रहे जस्टिस संजय करोल ने विदाई संबोधन में कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं हैं और हर फैसला सही होना संभव नहीं है। उन्होंने न्याय में विनम्रता, संवेदनशीलता और आम नागरिक की बात सुनने पर जोर दिया। उन्होंने करीब चार दशक के अपने कानूनी सफर को याद किया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त हो रहे न्यायमूर्ति संजय करोल ने शनिवार को अपने विदाई संबोधन में कहा कि न्यायाधीश भगवान नहीं होते और उनसे हर फैसला पूरी तरह सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि न्याय करने के लिए विनम्रता जरूरी है और न्यायाधीशों को हर मुकदमे में केवल याचिकाकर्ता नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े इंसान को भी देखना चाहिए।
क्या न्याय केवल कानून सही तरीके से लागू करने का नाम है?
न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि संविधान न्यायाधीशों से केवल कानून को सही तरीके से लागू करने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि न्यायपूर्ण तरीके से लागू करने की भी मांग करता है। उन्होंने कहा कि उनके लिए न्याय करना सिर्फ यह तय करना नहीं रहा कि कानूनी रूप से कौन सही है, बल्कि अदालत के सामने खड़े व्यक्ति की स्थिति और उसकी उम्मीदों को समझना भी इसका हिस्सा है। उन्होंने कहा "हम, न्यायाधीश, भगवान नहीं हैं। हम हर फैसला सही नहीं करेंगे।" उनके मुताबिक, न्यायाधीश के हाथ में सबसे अहम बात यह है कि वह व्यक्ति को सिर्फ याचिकाकर्ता के तौर पर न देखे।
क्या हर याचिका इंसान का दर्द बता सकती है?
जस्टिस करोल ने कहा कि किसी याचिका में मामले के तथ्य दर्ज हो सकते हैं, लेकिन वह यह नहीं बता सकती कि उस व्यक्ति ने पहले से क्या खोया है और वह अदालत से क्या उम्मीद लेकर आया है। इसलिए न्याय करने के लिए एक निश्चित स्तर की विनम्रता आवश्यक है। उन्होंने अदालतों में बोले गए तर्कों के साथ-साथ उन बातों को सुनने की जरूरत पर भी जोर दिया, जो शब्दों में नहीं कही जातीं। उन्होंने कहा कि अदालतों में कई बार 'खामोशियां' भी बहुत कुछ कहती हैं और न्यायाधीशों को उन्हें समझना सीखना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की असली ताकत कहां है?
अपने करीब चार दशक लंबे कानूनी सफर को याद करते हुए न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि उनके लिए अदालत कभी सिर्फ कार्यस्थल नहीं रही। उन्होंने कहा कि कोर्टरूम ने उन्हें हमेशा सहारा दिया और उनके जीवन में उनसे कहीं बड़ी तथा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि उन्होंने अदालतों में करीब 40 साल बिताए। शुरुआत में वह वकील के रूप में अदालत के सामने पेश होते थे और पिछले 19 वर्षों से न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे थे।
न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की असली अहमियत उस आम नागरिक के भरोसे में है, जो यह उम्मीद लेकर अदालत के दरवाजे तक पहुंचता है कि कोई उसकी बात सुनेगा। हालांकि, उन्होंने उन लोगों को भी याद रखने की जरूरत बताई, जो न्याय को बहुत दूर, महंगा या डराने वाला समझने के कारण अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते।
धर्म को न्याय से कैसे जोड़ते हैं जस्टिस करोल?
संवैधानिकता और न्याय के अर्थ पर बात करते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि कानून, उचित प्रक्रिया और संवैधानिक वैधता जैसे विचारों को समझने का सबसे सरल तरीका धर्म की अवधारणा हो सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यहां धर्म का अर्थ किसी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि कर्तव्य से है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का कर्तव्य न्याय का सम्मान करना और यह सुनिश्चित करना है कि अदालत के सामने खड़ा हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी छोटा या कमजोर क्यों न हो, देखा और सुना जाए।
क्या न्यायाधीश की जिम्मेदारी कोर्टरूम तक सीमित है?
बार के सदस्यों को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति करोल ने कहा कि न्याय करने के सिद्धांत केवल अदालत, काले चोगे और न्यायिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। हर व्यक्ति को अपने फैसलों, आचरण और सत्ता के इस्तेमाल में खुद भी न्यायाधीश की भूमिका निभानी होती है। उन्होंने कहा कि जीवन में हर व्यक्ति के छोटे-छोटे फैसले यह तय करते हैं कि वह दूसरों के साथ कितना न्याय करता है। उनके मुताबिक "जज तब भी जज होता है, जब वह चोगा पहनता नहीं है और चोगा उतारने के बाद भी।"
क्या संविधान को सिर्फ पढ़ना नहीं, जीना भी जरूरी है?
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की एक दिन पहले कही बात को याद करते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि भारत के पास केवल जीवंत संविधान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि देश को संविधान को जीना भी होगा। उन्होंने कहा कि संविधान की महानता केवल बड़े और महत्वपूर्ण मामलों में नहीं परखी जाती, बल्कि आम लोगों के रोजमर्रा के आचरण में भी उसकी परीक्षा होती है।
जस्टिस संजय करोल का न्यायिक सफर कैसा रहा?
न्यायमूर्ति संजय करोल का जन्म 23 अगस्त 1961 को हुआ था। उन्होंने शिमला में स्कूली शिक्षा पूरी की और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की। वर्ष 1998 में उन्हें हिमाचल प्रदेश का एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया। उन्होंने 2003 तक इस पद पर काम किया। वर्ष 1999 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा मिला और 8 मार्च 2007 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
नवंबर 2018 में वह त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। इसके बाद नवंबर 2019 में उन्हें पटना हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। 6 फरवरी 2023 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। अपने अंतिम कार्यदिवस पर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति करोल को भावुक विदाई दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ बार के वरिष्ठ सदस्यों, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप राय ने भी उन्हें श्रद्धांजलि और शुभकामनाएं दीं।
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
लोक अदालत को लेकर हुई बैठक - Sheikhpura News

राष्ट्रीय लोक अदालत में केसों के निष्पादन पर जोर - Darbhanga News

लोक अदालत को लेकर की बैठक - Munger News

पानीपत के रीपक कंसल बने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष, कोविड मुआवजा समेत कई याचिकाओं से रहे चर्चित - ripak kansal of panipat became the treasurer of the supreme court bar association and has been prominent in several petitions including those for covid compensation

सुप्रीम कोर्ट ने यमुना नदी के मैदान को हुए नुकसान के लिए 'आर्ट ऑफ लिविंग' को जिम्मेदार ठहराने वाले एनजीटी के आदेश को खारिज कर दिया; 5 करोड़ रुपए रिफंड का निर्देश दिया

न्यायमूर्ति संजय करोल ने पद छोड़ते हुए कहा, न्यायाधीश भगवान नहीं हैं, वे हर फैसले को सही नहीं देंगे - द ट्रिब्यून

लोक अदालत और मध्यस्थता: त्वरित समाधान का मार्ग

राष्ट्रीय लोक अदालत की तैयारी को लेकर बैठक
ताज़ा ख़बरें
- केंद्र ने अधिवक्ताओं के पैनल में शामिल होने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए
- केंद्र सरकार अधिवक्ताओं को पैनल काउंसिल के रूप में सूचीबद्ध करने के लिए दिशानिर्देश जारी करती है
- Bagpat News: छह लोगों ने किया अदालत में आत्मसमर्पण, जमानत मिली
- जस्टिस करोल बोले- जज भगवान नहीं, हर फैसला सही नहीं: फेयरवेल स्पीच देते हुए कहा- न्याय के लिए विनम्रता जरूरी
- कासिमाबाद में राष्ट्रीय लोक अदालत के लिए जागरूकता अभियान: तहसील और कोतवाली में लोगों को दी गई जानकारी - Sonbarsa(Kasimabad) News
- Delhi News: मधुबन चौक पर मेट्रो स्टेशन को अदालत से जोड़ेगा स्काईवॉक
- फरीदाबाद: अदालत की तीसरी मंजिल से कूदी 14 वर्षीय किशोरी, मेडिकल रिपोर्ट में गर्भवती मिलने पर घबराई - pregnant minor jumps from faridabad court seriously injured
- मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर

