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पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ने चुनाव आयोग की नियुक्ति को ‘असमान’ कहा, वोटर अधिकार की सुरक्षा पर चेतावनी

रायनागर और नंदीग्राम के उपचुनाव से पहले वोट देने से वंचित नागरिकों के लिए याचिकाकर्ताओं ने त्वरित सुनवाई मांगी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव मुखर्जी ने लोकतंत्र में मताधिकार के महत्व को दोहराया और SIR प्रक्रिया को वोटर अधिकार हटाने जैसा बताया। उन्होंने चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में अधिक निष्पक्षता की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। साथ ही, पश्चिम बंगाल के ट्रिब्यूनल में 37 लाख से अधिक अपीलें लंबित हैं, जिनमें केवल 1.26 लाख का निपटारा हुआ है, जबकि 22 लाख से अधिक लोग अपनी वोटर लिस्ट से हटाए जाने को चुनौती दे रहे हैं।

29 सितंबर 2026 को 11:04 am बजे
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ने चुनाव आयोग की नियुक्ति को ‘असमान’ कहा, वोटर अधिकार की सुरक्षा पर चेतावनी

सौजन्य से:- Navbharat Times

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अक्टूबर में रायनागर और नंदीग्राम निर्वाचन क्षेत्रों में उपचुनाव होने हैं, इसलिए वे उन नागरिकों के लिए जल्द सुनवाई चाहते थे, जिन्हें उपचुनाव से पहले वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। CJI सूर्यकांत ने मामले को 5 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया। इस मामले में एक मीडिया चैनल के पैनल में दो पूर्व जजों ने अपनी राय रखी है। इस पैनल में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता और मद्रास और मेघालय हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रह चुके जस्टिस संजीव मुखर्जी हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि अगर हर नागरिक को वोट देने का अधिकार न मिले तो लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाता।

बंगाल ट्रिब्यूनल में 37 लाख अपीलें लंबित

- सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के हलफनामे के अनुसार, अकेले बंगाल के लिए कोर्ट के आदेश पर बने ट्रिब्यूनल में 37 लाख से ज्यादा अपीलें लंबित हैं, जिनमें से अब तक केवल 1.26 लाख अपीलों का निपटारा हुआ है।

- 22 लाख से ज्यादा लोग वोटर लिस्ट से अपना नाम हटाए जाने को चुनौती दे रहे हैं। 16 लाख अपीलें उन नामों को हटाने के लिए दायर की गई हैं जिन्हें पहले मंज़ूरी मिल चुकी थी। और याद रखें, इस पर विवाद भी है। निपटारे की इस गति से, अकेले पश्चिम बंगाल की अपीलों पर फैसला करने में एक दशक से ज्यादा का समय लगेगा।

जस्टिस गुप्ता बोले-वोट देने का अधिकार न मिले तो लोकतंत्र क्या है?

जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा-'अगर हर नागरिक को वोट देने का अधिकार न मिले, तो लोकतंत्र क्या है? और SIR की यह प्रक्रिया तो वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने जैसी रही है... चुनाव आयोग की नियुक्ति की प्रक्रिया कहीं ज्यादा निष्पक्ष होनी चाहिए।'सुप्रीम कोर्ट को और ज्यादा विचार करना होगा: जस्टिस गुप्ता

जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा-मुझे लगता है कि निश्चित रूप से कोर्ट को और ज्यादा करना होगा। ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ कर सकते हैं, उन्हें और ज्यादा करना ही होगा, क्योंकि इसकी वजहें हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से पता चला है कि चुनाव आयोग के कई फैसले असल में चुनाव आयोग के फैसले नहीं थे। कानून के तहत, चुनाव आयोग या तो आम सहमति से काम करता है (जब तीनों सदस्य सहमत हों) या बहुमत से। इसलिए मुझे लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया के एक बड़े हिस्से पर शायद दोबारा विचार करना पड़ सकता है।जस्टिस संजीव बनर्जी ने अनुच्छेद 325 का दिया हवाला

- वहीं, जस्टिस बनर्जी ने कहा-संविधान का आर्टिकल 325 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को सिर्फ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर वोट देने के लिए अयोग्य नहीं माना जाएगा। आर्टिकल 326 भारत के हर नागरिक को वोट देने का अधिकार देता है, जब तक कि उसे किसी कानूनी आधार पर अयोग्य न ठहराया गया हो। इसलिए संविधान में इस बात पर जोर दिया गया है कि हर कोई वोट देने के योग्य है, जब तक कि उसे साफ तौर पर अयोग्य या ना-काबिल न पाया जाए।

- SIR में, लेकिन यह बात इसलिए नहीं कही गई क्योंकि याचिकाकर्ताओं या अपील करने वालों ने स्टे (रोक) की मांग नहीं की थी। आप देश के सुप्रीम कोर्ट हैं। आप हालात देखते हैं और वोट देने के अधिकार जैसी अहम बात पर भी कुछ नहीं कहते। यह बात मुझे बहुत परेशान करने वाली लगती है।

वोटिंग का अधिकार छिनने की चिंताएं

जजों ने कहा-22 लाख वे लोग थे जो बंगाल के लिए लॉजिकल गड़बड़ी वाली कैटेगरी में थे। बाकी वे लोग हैं जिनकी अपील खुद इलेक्शन कमीशन ने अलग-अलग आधारों पर दायर की है। तो कुल संख्या 38 लाख है। जिसमें से 22 लाख लोग लॉजिकल गड़बड़ियों के कारण अब तक अपील कर चुके हैं। लेकिन आपका कहना है कि कोर्ट को बहुत पहले दखल देना चाहिए था। ताकि यह बोझ नागरिक पर न डाला जाए कि वह साबित करे कि वह एक योग्य वोटर है, बल्कि यह बोझ इलेक्शन कमीशन पर डाला जाए।नागरिकता का फैसला चुनाव आयोग नहीं, गृह मंत्रालय के पास

जस्टिस बनर्जी ने कहा-चुनाव आयोग के काम-काज में दखल देने से हिचकिचाते रहे हैं, जिसे वे असल में चुनाव आयोग का अधिकार-क्षेत्र मानते हैं...। चुनाव आयोग का काम चुनाव कराना और उनकी देखरेख करना। हाँ, लेकिन यह संविधान और कानूनों से भी नियंत्रित होता है। मगर, चुनाव आयोग के पास नागरिकता पर फैसला करने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, नागरिकता पर फैसला गृह मंत्रालय करता है।जस्टिस गुप्ता ने कहा-'जो लोग यह सुन रहे हैं, वे सोचेंगे कि अदालतें क्या कर सकती हैं? जैसा कि मैंने कहा, अनुच्छेद 324, 326 से अदालतें शक्तियों के बंटवारे को सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं। चुनाव आयोग क्या करता है या क्या नहीं करता, इस मामले में हम एक हद से ज्यादा दखल नहीं देंगे। हम नहीं चाहते चुनाव आयोग के साथ टकराव, भले ही मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी यह मानते हों कि आज भरोसा कम हुआ है। चुनाव आयोग और संवैधानिक अधिकारियों के बीच। तो ऐसा लगता है कि अदालत लक्ष्मण रेखा पार करने से हिचकिचा रही है।

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