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सुप्रीम कोर्ट में Samadhan Samaroh 2026: बैंकिंग से RERA और Family केस तक, हर बड़े केस में समझौते का मौका

सुप्रीम कोर्ट का Samadhan Samaroh 2026 21, 22 और 23 अगस्त 2026 को विशेष लोक अदालत के साथ अपने अंतिम चरण में पहुंचेगा। इसके जरिए ऐसे लंबित मामलों का आपसी सहमति से समाधान होगा, जिनमें समझौते की गुंजाइश है। नई दिल्ली: सुप्र…

19 अगस्त 2026 को 11:54 am बजे
सुप्रीम कोर्ट में Samadhan Samaroh 2026: बैंकिंग से RERA और Family केस तक, हर बड़े केस में समझौते का मौका

सौजन्य से:- Navbharat Times

सुप्रीम कोर्ट का Samadhan Samaroh 2026 21, 22 और 23 अगस्त 2026 को विशेष लोक अदालत के साथ अपने अंतिम चरण में पहुंचेगा। इसके जरिए ऐसे लंबित मामलों का आपसी सहमति से समाधान होगा, जिनमें समझौते की गुंजाइश है।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट लंबित मामलों के जल्द और आपसी सहमति से समाधान के लिए Samadhan Samaroh 2026 आयोजित कर रहा है। यह पहल 21 अप्रैल 2026 को शुरू हुई थी और इसका समापन 21 से 23 अगस्त तक होने वाली विशेष लोक अदालत के जरिए होगा। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक इसका उद्देश्य लोगों को लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी से राहत दिलाना और जहां संभव हो, बातचीत और सहमति के जरिए विवाद खत्म करना है। बैंकिंग, सिविल, MACT, Consumer-RERA, Family Law, Labour, Land Acquisition, Rent, Service Law और Tax से जुड़े मामले जो अटके पड़े हैं, और समझौते की गुंजाइश है.. उनका समाधान निकाला जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय का ' समाधान समारोह 2026 ' और इसकी व्यापकता

दरअसल लंबित मामलों को लेकर शीर्ष अदालत भी चिंतित है। ऐसे में कह सकते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का 'समाधान समारोह 2026' देश भर में मध्यस्थता (Mediation) और लोक अदालत के माध्यम से लंबित मुकदमों का आपसी सहमति और सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारा करने की एक राष्ट्रव्यापी पहल है।

इसका सबसे अहम चरण आगामी 21, 22 और 23 अगस्त 2026 को आयोजित होने वाली विशेष लोक अदालत है, जिसमें चिन्हित किए गए 45,000 से अधिक मामलों का त्वरित समाधान किया जाएगा। ये मामले होंगे, बैंकिंग विवाद, दीवानी मामले, पारिवारिक कानून, मोटर दुर्घटना दावा, उपभोक्ता/रेरा (RERA) और कर विवाद से जुड़े 45,000 से अधिक मामले।

यहां यह जानना जरूरी है कि यह पूरी तरह से आपसी सहमति पर आधारित है। इसमें पक्षकार भौतिक रूप से या वर्चुअल माध्यम से भी जुड़ सकते हैं, जिससे उन्हें दिल्ली आने की अनिवार्यता नहीं रहती है।

समाधान समारोह और शीर्ष अदालत की तैयारियां

दरअसल पार्टिसिपेटिव जस्टिस' और 'डोरस्टेप डिलीवरी ऑफ जस्टिस' की अवधारणा पर आधारित 21 अप्रैल 2026 से शुरू हुए इस अभियान का समापन 21, 22 एवं 23 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय परिसर में आयोजित विशेष लोक अदालत के साथ होगा। इसकी तैयारियों के मद्दे नजर समाधान समारोह के तहत 21 अप्रैल से ही राज्य, जिला, तालुका एवं उच्च न्यायालय विधिक सेवा प्राधिकारों के मध्यस्थता केंद्रों में सुलह के लिए बैठकें आयोजित की जा रही हैं। अब 21, 22 एवं 23 अगस्त 2026 को केवल सर्वोच्च न्यायालय में लंबित उपयुक्त मामलों का सुलह एवं आपसी सहमति के आधार पर निस्तारण किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की स्वीकृति के बाद गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने इस आयोजन के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए राष्ट्रीय, राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकारों को भी जरूरी निर्देश जारी किए हैं।

यही सबसे महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य है। Legal Services Authorities Act , 1987 की Section 21 के मुताबिक लोक का फैसला सिविल कोर्ट की डिक्री या संबंधित मामले में अन्य कोर्ट के आदेश के समान माना जाता है। कानून यही कहता है कि लोक अदालत का फैसला अंतिम और बाध्यकारी होता है। यानी समझौते के आधार पर फैसला हो जाने के बाद वह दोनों पक्षों पर लागू होता है और सामान्य तौर पर उसके खिलाफ अपील का रास्ता नहीं होता।

सरल शब्दों में इसका मकसद है कि जहां विवाद बातचीत से खत्म हो सकता है, वहां पक्षकारों को लंबी कानूनी लड़ाई जारी रखने के बजाय समझौते का अवसर मिले। वैसे शीर्ष अदालत का कहना है किइस पहल का उद् देश्य 'प्रतिभागी न्याय' यानी लोगों की भागीदारी वाले न्याय और 'न्याय की दहलीज तक पहुँच' की सोच को मजबूत करना है। इसमें सबसे अहम बात यह है कि अगर यहां समझौता हो जाता है और फैसला जारी होता है, तो वह अंतिम और बाध्यकारी होता है। मतलब अदालती झंझटों से हमेशा के लिए आजादी।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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