केरल हाई कोर्ट ने कहा: बाल विवाह और असहमति यौन संबंध पर POCSO लागू, व्यक्तिगत कानून से कोई छूट नहीं
कोर्ट ने 17 वर्षीया लड़की के साथ इस्लामी रीति से शादी कर बलात्कार का आरोप लगने पर POCSO एक्ट और IPC धारा 376 के तहत मामला रद्द नहीं किया, यह रेखांकित किया कि 18 वर्ष से कम आयु की लड़की की सहमति को कानूनी रूप से शून्य माना जाता है और व्यक्तिगत या धार्मिक कानून का कोई विशेष अधिकार नहीं है। इस फैसले से बाल अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सभी धार्मिक संस्थाओं को चेतावनी दी गई है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
केरल हाई कोर्ट में मामला और फैसला
मामले में पलक्कड़ के एक 27 साल के आरोपी ने 23 जुलाई 2021 को इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार उससे शादी की थी, जब वह 17 साल की थी। बाद में आरोपी ने कथित तौर उसके साथ जबरदस्ती यौन संबंध बनाए। केरल हाई कोर्ट में जब मामला आया था तो अदालत ने व्यक्ति के खिलाफ 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण' कानून के तहत दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाता है, तो उस पर POCSO ACT के साथ साथ, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है, भले ही वह लड़की उसकी पत्नी ही क्यों न हो।शरीयत या पर्सनल लॉ बनाम POCSO एक्ट
केरल हाईकोर्ट ने साफ किया है कि पोक्सो एक्ट एक विशेष और धर्मनिरपेक्ष (Secular) कानून है। यह कानून हर नागरिक पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से हो। धार्मिक पर्सनल लॉ के तहत दी गई कोई भी छूट इस एक्ट के सख्त प्रावधानों को खत्म नहीं कर सकती। इसलिए, पर्सनल लॉ या मान्यताओं का हवाला देकर पोक्सो के तहत दर्ज मुकदमों से बिल्कुल भी बचा नहीं जा सकता है।पॉक्सो कानून के तहत नाबालिग कौन है
जैसा कि कठोर पॉक्सो कानून के प्रावधान के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु का हर व्यक्ति बच्चा (नाबालिग) माना जाता है। औऱ इसी सिलसिले में केरलम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी लड़की की उम्र 18 साल से कम है, तो उसके साथ विवाह करना पूरी तरह गैरकानूनी है। हालांकि पर्सनल लॉ में यौवन (प्यूबर्टी) की उम्र को शादी के योग्य माना जा सकता है, लेकिन भारतीय पोक्सो एक्ट इसे सिरे से खारिज करता है। कानूनी तौर पर 18 साल से पहले की गई शादी में शारीरिक संबंध बनाना एक गंभीर अपराध है।नाबालिग की सहमति की कोई अहमियत नहीं
कानून की नजर में एक नाबालिग अपनी सहमति देने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से परिपक्व नहीं होता है। अगर ऐसी शादी के बाद कोई आरोपी यह दावा करता है कि नाबालिग ने अपनी मर्जी से शादी की है या यौन संबंध बनाए हैं, तो भी इसे अपराध ही माना जाएगा। पॉक्सो के तहत नाबालिग की सहमति को कानूनी रूप से शून्य (Zero) माना जाता है। हाई कोर्ट ने साफ किया ऐसे मामलों में आरोपी को 'सहमति' का बचाव लेने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है।बाल अधिकारों की बात बच्चों के हित में
देखा जाए तो केरल हाईकोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट रुप से स्थापित होता है कि बच्चों के मौलिक और मानवाधिकार किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज या परंपरा से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। कोर्ट ने माना कि बाल विवाह बच्चों के बचपन, शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार को हमेशा के लिए छीन लेता है। इसलिए, बाल अधिकारों की रक्षा के लिए पोक्सो एक्ट का सख्ती से पालन किया जाना बेहद जरूरी है। ऐसे में अदालतों का मुख्य उद्देश्य बच्चों के जीवन और उनके शारीरिक अधिकारों की हर हाल में रक्षा करना है।शरीयत के साथ अन्य धर्मों के लिए भी कड़ा मैसेज
अपने फैसले से केरलम हाईकोर्ट ने धार्मिक पर्सनल लॉ बोर्ड्स और संस्थाओं को कड़ा मैसेज दिया है। कोई भी धार्मिक संस्था या बोर्ड ऐसे विवाहों को प्रमाणित करके या मान्यता देकर आरोपी को कानूनी कार्रवाई से नहीं बचा सकता। काजी, मौलवी, पंडित या कोई भी व्यक्ति जो ऐसी गैरकानूनी शादियां करवाते हैं, वे भी इस कानून के दायरे में आ सकते हैं। धर्म या आस्था के नाम पर बच्चों के शोषण को न्याय व्यवस्था किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करेगी।दोनों पहले से शादीशुदा तो शादी का वादा कैसे? हिमाचल हाई कोर्ट ने ‘False Promise to Marry’ में जमानत पर क्या कहा
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