स्कूल रैगिंग‑बुलिंग रोकथाम के लिए अलग कानून की मांग वाली PIL को SC ने खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों व प्री‑यूनिवर्सिटी संस्थानों में रैगिंग‑बुलिंग को रोकने हेतु एक विशिष्ट केंद्रीय कानून बनवाने की मांग वाली जनहित याचिका को सुनवाई से इनकार कर दिया, क्योंकि ऐसे मुद्दों पर पहले ही निर्देश जारी हो चुके हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकारियों के सामने अपना मुद्दा रखने की अनुमति दी, पर नई याचिका पर विचार नहीं किया।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी शिक्षण संस्थानों में रैगिंग और बुलिंग की समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय कानून बनाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
राजेश चौधरी, नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी शैक्षणिक संस्थानों में बुलिंग और रैगिंग रोकने के लिए अलग केंद्रीय कानून तथा समान दिशानिर्देश बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही फैसला सुना चुका है। पीठ ने कहा कि पहले दिए गए निर्देशों के कार्यान्वयन की मांग के लिए नई याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को संबंधित अधिकारियों के समक्ष इस मुद्दे पर रिप्रजेंटेशन देने की अनुमति दे दी।
केंद्र से कानून बनाने की मांग
याचिका में केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के अलावा CBSE और CISCE को पक्षकार बनाया गया था। इसमें स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी संस्थानों में बुलिंग और रैगिंग की समस्या से निपटने के लिए उपयुक्त केंद्रीय कानून बनाने और उसे लागू करने के निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने प्रस्तावित कानून के साथ पूरक दिशानिर्देश तैयार करने की भी मांग की थी, ताकि देशभर के स्कूलों और प्री-यूनिवर्सिटी संस्थानों में उन्हें अनिवार्य रूप से लागू किया जा सके। इसका उद्देश्य बुलिंग और रैगिंग से जुड़ी शिकायतों पर प्रभावी तरीके से सुनवाई और उनका निपटारा सुनिश्चित करना था।
पाठ्यक्रम में भी शामिल करने की मांग
याचिका में छात्रों को बुलिंग और रैगिंग के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करने के लिए पाठ्यक्रम में एक अनिवार्य विषय शामिल करने की मांग भी की गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि यह विषय केंद्रीय और राज्य शिक्षा बोर्डों के तहत आने वाले सभी स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य छात्रों में बुलिंग और रैगिंग के खिलाफ जागरूकता पैदा करना तथा ऐसी घटनाओं की शिकायत और निपटारे के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करना था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन मुद्दों पर पहले ही न्यायिक निर्देश दिए जा चुके हैं और उनके क्रियान्वयन के लिए नई जनहित याचिका दाखिल करना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की स्वतंत्रता के साथ याचिका का निपटारा कर दिया।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें
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