बाल विवाह की दहलीज पर बिहार के कानून : हाईकोर्ट में अब सुस्त जवाबदेही, कोई कार्रवाई नहीं, बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग
बिहार में बाल विवाह रोकने के लिए पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। विश्वविद्यालय के जेंडर रिसोर्स सेंटर ने जनमन पीपुल्स फाउंडेशन के साथ मिलकर यह याचिका दाखिल की है। याचिका में इस बात का प्रार्थना की गई है कि राज्य में बाल विवाह रोकने वाले कानूनों को जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू किया जाए।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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कानून की दहलीज पर बचपन:बिहार में बाल विवाह रोकने के लिए पटना हाईकोर्ट में पहली बार उतरा सीएनएलयू; सरकार से विस्तृत जवाब मांगा
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हाईकोर्ट ने कहा- 19 अगस्त को होगी अगली सुनवाई, बिहार में 34.6% बेटियों के हाथ 18 से पहले हो रहे पीले
बिहार की बेटियों का बचपन बचाने के लिए अब राज्य की सबसे बड़ी कानून की संस्था, चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (सीएनएलयू) खुद कानूनी मैदान में उतरा है। विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार, सीएनएलयू के जेंडर रिसोर्स सेंटर ने जनमन पीपुल्स फाउंडेशन के साथ मिलकर पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की है।
इस याचिका का सबसे अहम पहलू यह है कि इसमें राज्य में बाल विवाह रोकने वाले कानूनों को महज कागजों से निकालकर जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू करने की गुहार लगाई गई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस पर संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय और न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने कोर्ट से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा। अदालत ने इसे स्वीकार करते हुए अब अगली सुनवाई के लिए 19 अगस्त की तारीख तय की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई है कि कानूनी पाबंदियों के बावजूद बिहार के कई जिलों में बाल विवाह का चलन आज भी चिंताजनक है। यूनिवर्सिटी प्रशासन का मानना है कि यह कानूनी पहल इस कुरीति के खिलाफ निर्णायक मोड़ साबित होगी।
सुधार हुआ, लेकिन स्थिति खौफनाक
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस-6, 2023-24) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि बिहार बाल विवाह के मामले में देश में दूसरे स्थान पर बना हुआ है। पहले नंबर पर पश्चिम बंगाल (36.4%) है। सर्वे के मुताबिक, बिहार में 20-24 वर्ष की आयु वाली 34.6% महिलाओं का विवाह 18 साल से कम उम्र में ही हो गया था। हालांकि, यह एनएफएचएस-5 के 40.8% के मुकाबले बेहतर है, लेकिन राष्ट्रीय औसत (20.1%) से यह अब भी 14.5% अधिक है। सबसे डराने वाली बात यह है कि सर्वेक्षण के समय 15-19 वर्ष की 11.4% किशोरियां या तो मां बन चुकी थीं या गर्भवती थीं। बिहार के 38 में से 12 जिले ऐसे हैं जहां बाल विवाह की दर राज्य के औसत (34.6%) से भी कहीं ज्यादा है। इनमें लखीसराय, सुपौल, अररिया, मधेपुरा, जमुई, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, बेगूसराय, बांका, कटिहार और पूर्वी चंपारण शामिल हैं।
कागजी कानून व सामाजिक मजबूरी के बीच पिसती बेटियां
बिहार में बाल विवाह के खिलाफ कड़े कानून होने के बाद भी राज्य का देश में दूसरे नंबर पर होना कई गंभीर सवाल खड़े करता है…
1 कानून तो हैं, पर कार्यान्वयन नहीं
पहली बार सीएनएलयू जैसी संस्था का कोर्ट जाना यह बताता है कि प्रशासनिक मशीनरी बाल विवाह रोकने में पूरी तरह सफल नहीं रही है। कानून तो हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन कमजोर है।
2 शिक्षा-जागरूकता का अभाव
पूर्वी बिहार के 12 जिलों में औसत से अधिक मामले यह संकेत देते हैं कि इन इलाकों में जागरूकता अभियान और बेटियों की शिक्षा और जागरुकता पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है।
3 स्वास्थ्य पर संकट
11.4% किशोरियों का समय से पहले मां बनना न केवल एक कानूनी अपराध है, बल्कि यह मातृ मृत्यु दर और कुपोषण की समस्या को भी सीधे तौर पर बढ़ा रहा है। इससे कई परेशानी भी हो रही है।
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