'वयस्कों के फैसलों पर अदालत नैतिक टिप्पणी नहीं कर सकती': सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वयस्कों द्वारा अपने निजी रिश्तों में लिए गए फैसलों पर नैतिक टिप्पणी करना अदालत का काम नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे फैसलों के किसी भी बुरे नतीजे को अपने आप 'आपराधिक अपराध' नहीं माना जा सकता, जिसमें राज्य (सरकार/प्रशासन) को दखल देने की जरूरत पड़े। कोर्ट ने कहा, "यह दोहराना जरूरी है कि देश के नागरिकों द्वारा अपनी मर्जी, आजादी और स्वायत्तता से लिए गए फैसलों पर नैतिक टिप्पणी करना इस अदालत का काम नहीं है। वयस्क पुरुष और महिलाएं अपनी मर्जी से ऐसे फैसले ले सकते हैं जो समझदारी भरे हों

सौजन्य से:- लाइव लॉ हिंदी
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वयस्कों द्वारा अपने निजी रिश्तों में लिए गए फैसलों पर नैतिक टिप्पणी करना अदालत का काम नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे फैसलों के किसी भी बुरे नतीजे को अपने आप 'आपराधिक अपराध' नहीं माना जा सकता, जिसमें राज्य (सरकार/प्रशासन) को दखल देने की जरूरत पड़े। कोर्ट ने कहा, "यह दोहराना जरूरी है कि देश के नागरिकों द्वारा अपनी मर्जी, आजादी और स्वायत्तता से लिए गए फैसलों पर नैतिक टिप्पणी करना इस अदालत का काम नहीं है। वयस्क पुरुष और महिलाएं अपनी मर्जी से ऐसे फैसले ले सकते हैं जो समझदारी भरे हों
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