सुप्रीम कोर्ट में दीपक प्रकाश ने हलफनामा दायर किया, अब एमएलसी‑स्थिति बदलने से याचिका रद्द की मांग
बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर 15 सितंबर को सुनवाई होगी। उन्होंने 14 सितंबर को जवाबी हलफनामा पेश कर कहा कि याचिकाकर्ता ने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को सिद्ध नहीं किया और अब वे विधान परिषद के सदस्य हैं, इसलिए याचिका को खारिज किया जाना चाहिए। सरकार ने अभी तक अपना उत्तर नहीं दिया।

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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'अब मैं MLC, स्थिति बदल गई है, याचिका रद्द हो':सुप्रीम कोर्ट में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश ने दायर किया हलफनामा, आज सुनवाई
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बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आज यानी 15 सितंबर को सुनवाई होगी।
सुनवाई से पहले दीपक प्रकाश ने 14 सितंबर को अपना जवाबी हलफनामा कोर्ट में दायर किया। वहीं, अब तक बिहार सरकार ने अपना जवाब कोर्ट में दाखिल नहीं किया है।
याचिका सीनियर BJP लीडर राजेश कुमार सिंह ने दायर की है। पिछली सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार और दीपक प्रकाश से लिखित में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया था।
दीपक प्रकाश बोले- याचिकाकर्ता अधिकारों के उल्लंघन साबित नहीं कर पाए
दीपक प्रकाश ने अपने जवाबी हलफनामे में याचिका को खारिज करने की मांग की है। कहा, ऑर्टिकल-32 के तहत दायर जनहित याचिका गलत आधार पर है। याचिकाकर्ता मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को साबित नहीं कर पाए हैं। कोरम वारंट तभी जारी हो सकता है, जब संविधान के प्रावधानों का स्पष्ट और गंभीर उल्लंघन हो। उनकी नियुक्ति संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप है।
अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई मंत्री लगातार छह महीने तक विधायिका का सदस्य बन बिना पद के नहीं रह सकता। हमारी पहली नियुक्ति 22 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मंत्रिपरिषद में हुई।
मुख्यमंत्री के इस्तीफे के बाद 15 अप्रैल 2026 को सरकार समाप्त हो गई। पहला कार्यकाल पांच महीने से कम रहा, इसलिए छह महीने की सीमा पार नहीं हुई।
मुख्यमंत्री के इस्तीफे के साथ पूरी मंत्रिपरिषद समाप्त हो गई। 22 दिनों के अंतराल के बाद सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। 7 मई 2026 को नई मंत्रिपरिषद में उनकी नई नियुक्ति हुई।
पंजाब के फैसले को याचिकाकर्ता ने आधार बनाया
याचिकाकर्ता ने S.R. Chaudhuri बनाम पंजाब (2001) के फैसला को आधार बनाया है। जबकि, इस मामले पर वह सीधे लागू नहीं होता। उस मामले में एक ही मुख्यमंत्री की कैबिनेट में छह महीने से पहले इस्तीफा देकर तुरंत नियुक्ति हुई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के साथ धोखा माना था। यहां वास्तविक इस्तीफे से पूरी सरकार खत्म हुई, फिर अलग मुख्यमंत्री के नेतृत्व में नई सरकार बनी।
दोनों नियुक्तियों के बीच 22 दिन तक वे मंत्री पद पर नहीं थे। इससे स्पष्ट है कि दूसरी नियुक्ति पहली को जारी रखने की कोशिश नहीं थी। वे नवंबर 2026 तक की छह महीने की अवधि में विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनने का प्रयास करने वाले थे।
नए मुख्यमंत्री को अनुच्छेद 164(1) के तहत अपनी टीम चुनने का अधिकार है। केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति पहले समाप्त सरकार में मंत्री था, नए मुख्यमंत्री के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।
इस मामले की सुनवाई के दौरान 5 अगस्त 2026 को राज्यपाल ने अनुच्छेद 171 के तहत हमें विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया है। 6 अगस्त 2026 को शपथ ली।
याचिका दायर होने के समय की स्थिति बदल चुकी है। कोर्ट को वर्तमान स्थिति में भी देखना होगा कि उन्हें मंत्री पद से हटाने की मांग अब भी उचित है या नहीं।
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