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वैवाहिक दुष्कर्म पर सुनवाई: क्या पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध पति को अपराध मुक्त कर देते हैं?

सुप्रीम कोर्ट वैवाहिक दुष्कर्म के मुद्दे पर सुनवाई करेगा, जिसमें यह तय होगा कि पति को वैवाहिक दुष्कर्म के आरोप से छूट मिलने पर क्या पत्नी के साथ हिंसक यौन कृत्यों के लिए उसे अन्य आपराधिक धाराओं में मुकदमा चलाया जा सकता है। यह सुनवाई महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े कानूनों की नई व्याख्या तय कर सकती है।

17 जुलाई 2026 को 06:13 am बजे
वैवाहिक दुष्कर्म पर सुनवाई: क्या पत्नी के साथ जबरन यौन संबंध पति को अपराध मुक्त कर देते हैं?

सौजन्य से:- Navbharat Times

लेकिन अब एक उम्मीद जगी है...सुप्रीम कोर्ट ने एक नए और महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार करने की सहमति दी है। अदालत यह तय करेगी कि यदि मौजूदा कानून पति को वैवाहिक दुष्कर्म के आरोप से छूट देता है, तो क्या पत्नी के साथ हिंसक, अप्राकृतिक या जबरन यौन कृत्य करने पर उसके खिलाफ अन्य आपराधिक धाराओं में मुकदमा चलाया जा सकता है। यह सुनवाई महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और वैवाहिक अधिकारों से जुड़े कानूनों की नई व्याख्या तय कर सकती है।

स्त्री-पुरुष के 'अंतरंग संबंध' जरूरी नहीं सहमति से हों, धोखा या ब्लैकमेल हो तो रेप माना जाएगा, मद्रास हाई कोर्ट के फैसले की बड़ी बात

कहानी एक पीड़िता की, साहस की जीत

यह कहानी एक ऐसी ही बहादुर महिला आलिया (नाम बदल दिया गया है) की है, जिसकी शादी बिलकुल परफेक्ट पति से हुई.. पढ़ा-लिखा, अच्छी नौकरी वाला, अच्छा परिवार। लेकिन शादी के बाद असलियत सामने आई। पति शराब और ड्रग्स की दुनिया में डूबा। और हर रोज बगैर सहमति की परवाह किए लगभग रेप को अंजाम देता। बेटे के जन्म के बाद उम्मीद कि अब ठीक हो जाएगा। लेकिन एक रात, सोये बेटे के सामने, उससे भयंकर दुराचार हुआ। अगली सुबह, वह हमेशा के लिए बेटे को लेकर घर से निकल गई। पुलिस में शिकायत हुई...कोई बड़ा फायदा नहीं। लेकिन उसने बेटे के साथ अपनी जिंदगी स्क्रैच से शुरू की..नया घर, नई मुश्किलें, लेकिन आजादी। यह कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि हजारों ऐसी महिलाओं की है जो ऐसे वैवाहिक बलात्कार का शिकार हैं। ऐसे मामलों के लिए इंसाफ मांगने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंची हैं।स्कूल में हुए यौन-शोषण की जानकारी छुपायी, तो प्रिंसिपल, हेड मिस्ट्रेस होंगे जिम्मेदार, सुप्रीम कोर्ट ने POCSO केस में दी गाईडलाईन्स

सुप्रीम कोर्ट किन कानूनी सवालों पर करेगा सुनवाई?

- सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहले से ही ऐसे कई मामले और वैवाहिक दुष्कर्म को कानूनी छूट देने वाले प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएं लंबित हैं।

- अब अदालत ने इसके एक दूसरे पहलू पर भी विचार करने का निर्णय लिया है। सवाल यह है कि यदि वर्तमान कानूनों के तहत पति पर वैवाहिक दुष्कर्म का मुकदमा नहीं चल सकता, तो क्या पत्नी के साथ हिंसक, अप्राकृतिक या जबरन यौन व्यवहार के लिए उसे शारीरिक चोट, मानसिक प्रताड़ना या क्रूरता जैसी धाराओं में अभियोजित किया जा सकता है।

- अदालत ने इस मुद्दे को महिलाओं के सम्मान और शारीरिक स्वायत्तता से जुड़ा गंभीर संवैधानिक प्रश्न माना है। इस सुनवाई का असर भविष्य में वैवाहिक संबंधों से जुड़े आपराधिक कानूनों की व्याख्या पर पड़ सकता है।

- अब शीर्ष अदालत इस पर वह 9 सितंबर से सभी याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी।

याचिका के जरिए उठे सवाल

इस मामले से जुड़ी याचिका जो एक NGO की ओर से डाली गई थी, उनके वकील ने चीफ़ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच को बताया कि BNS के उन प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी जा रही है जो वैवाहिक बलात्कार को बलात्कार के अपराध से छूट देते हैं। पर सवाल यह है कि यौन गतिविधियों के ज़रिए अपनी पत्नी को चोट पहुँचाने वाले पति पर न्याय संहिता के अन्य प्रावधानों के तहत मुक़दमा क्या चलाया जा सकता है। निर्भया मामले के बाद जस्टिस वर्मा आयोग की सिफ़ारिशों पर लागू 'आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013' ने इस अपवाद का दायरा बढ़ाकर इसमें पतियों द्वारा की जाने वाली सभी तरह की यौन गतिविधियों को शामिल कर लिया है।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले ने क्यों बढ़ाई कानूनी बहस?

हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले में पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत लगाए गए आरोपों को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था में विवाह के भीतर ऐसे आरोप धारा 377 के तहत अपराध नहीं माने जा सकते। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध, शारीरिक हिंसा और प्रताड़ना हुई है तो ऐसे कृत्य वैवाहिक क्रूरता के दायरे में आ सकते हैं और संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई संभव है। इसी फैसले के बाद यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो गया कि पति की कानूनी जिम्मेदारी की सीमा आखिर क्या है।कानून निर्माताओं का पक्ष

भारत में पुराने IPC के प्रावधानों के तहत, अगर पत्नी की उम्र 15 साल या उससे ज़्यादा है, तो पति को अपनी पत्नी के साथ सेक्स करने पर रेप के आरोपों से छूट मिलती है। 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस उम्र सीमा को बढ़ाकर 18 साल कर दिया था, जिसे BNS 2023 में भी साफ़ तौर पर अपनाया गया है। इस मामले में केंद्र सरकार ने मैरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाने का विरोध किया है। इस मामले में सरकार का पक्ष रहा है कि शादी एक अनोखा रिश्ता है जो सिर्फ़ सेक्स पर आधारित नहीं है। हालांकि सरकार ने यह भी माना है कि पति को अपनी पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने का कोई अधिकार नहीं है।पत्नी को अपनी जिंदगी चुनने का अधिकार, साथ छोड़ चुकी पत्नी को वापस लाने के लिए ‘हैबियस कॉर्पस’ नहीं चलेगा : उड़ीसा हाईकोर्ट

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