49 साल पुराने हत्या केस में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बनाया बरी
सुप्रीम कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि ट्रायल और हाई कोर्ट में अभियोजन पक्ष के सबूतों और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही में गंभीर खामियां थीं।

सौजन्य से:- Navbharat Times
Heeralal Served Life Sentence In 49 Year Old Murder Case Acquitted Supreme Court Says High Court And Trial Court Made A Mistake
49 साल पुराने मर्डर केस में शख्स ने काटी उम्रकैद की सजा, अब सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी; कहा- हाई कोर्ट से गलती हुई
Contributed by: Amit Anand Choudhary•Edited by: अभिषेक पाण्डेय|टाइम्स न्यूज नेटवर्क•
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49 साल पुराने हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के सबूतों और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही में गंभीर खामियां थीं। इनमें से एक आरोपी हीरा लाल उम्रकैद की सजा काट चुका था।
नई दिल्ली: साल 1963 में बर्मिंघम जेल से लिखे गए एक लेटर में मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा था कि, 'समय पर न्याय न मिले, तो वह अन्याय के समान होता है।' इस सच्चाई को 1977 के एक मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने फिर उजागर किया है। करीब 49 साल पुराने इस मामले में सर्वोच्च अदालत ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया है, लेकिन इनमें से एक आरोपी पहले ही उम्रकैद की सजा काट चुका था।
उत्तर प्रदेश के इस हत्या के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहरा की बेंच ने सुनवाई करते हुए तीनों आरोपियों को संदेह की स्थिति का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। जबकि केस के दो अन्य आरोपी सुनवाई के दौरान ही दुनिया छोड़ चुके थे। इन सभी आरोपियों को ट्रायल और हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
आरोपी ने हमेशा खुद को बताया था निर्दोष
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरी किए गए आरोपियों में हीरा लाल भी शामिल हैं। हीरा लाल शुरू से ही खुद को निर्दोष बताते रहे हैं। ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में दो आरोपियों को जमानत दे दी थी, लेकिन हीरा लाल की जमानत याचिका खारिज हो गई थी। उन्हें जेल में ही रहना पड़ा। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सजा माफ किए जाने के बाद वह जेल से बाहर आए।
अदालत ने चश्मदीदों की गवाही मानने से किया इनकार
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहरा की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, अभियोजन पक्ष के मामले में गंभीर खामियां थीं। अदालत ने कथित चश्मदीदों की गवाही को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि बचाव पक्ष की इस दलील को 'काल्पनिक और अटकलबाजी कहर खारिज नहीं किया जा सकता है।'
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
अदालत ने कहा, 'हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा है कि घटना 28 जून, 1977 की दोपहर को हुई थी या उस तरह हुई थी जैसा कथित चश्मदीदों ने बताया था। नतीजतन, घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी न केवल संदिग्ध बल्कि बहुत ही असंभव हो जाती है, साथ ही ऐसे अनिश्चित और अविश्वसनीय सबूतों के आधार पर अभियोजन पक्ष का मामला नहीं टिक सकता।'
बेंच ने कहा, 'अभियोजन पक्ष की कहानी पूरी तरह से इन्हीं गवाहों के बयानों पर टिकी थी, जो अब खारिज हो गई है और टिक नहीं सकती। ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने इन अहम कमियों को नजरअंदाज करने और आरोपी को दोषी ठहराने के लिए तथाकथित चश्मदीद गवाहों के बेहद संदिग्ध बयानों पर भरोसा करने में गलती की। इसलिए, हमारी सोच यह है कि अभियोजन पक्ष आरोपी-अपीलकर्ताओं का दोष बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में नाकाम रहा है।'
अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित नहीं कर पाया, इसलिए उन्हें बरी किया जाता है।
लेखक के बारे मेंअभिषेक पाण्डेयअभिषेक पाण्डेय नवभारत टाइम्स में डिजिटल में पत्रकार हैं। वे जुलाई- 2025 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के नवभारत टाइम्स, डिजिटल विंग से जुड़े। वह वर्तमान में नेशनल और दिल्ली डेस्क से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं। पत्रकारिता में बतौर रिपोर्टर और डेस्क पर काम करने का 4 वर्षों का अनुभव है। नवभारत टाइम्स में जुड़ने से पहले वह दैनिक जागरण में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे। अभिषेक ने 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव 2024, महाकुंभ 2025 को काफी करीब से कवर किया है। अभी वह राष्ट्रीय स्तर पर हो रही सियासी उथल-पुथल, सामाजिक परिवर्तन और क्राइम से जुड़ी खबरों पर बारीकी से नजर रखते हैं।
विशेषज्ञता
उत्तर भारत के राज्यों की सियासी व आपराधिक घटनाक्रम पर अच्छी पकड़, किताबों के जरिए इतिहास को वर्तमान के पन्नों में खंगालने की कोशिश।
पत्रकारिता अनुभव
रामा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद अभिषेक पाण्डेय ने दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में पत्रकारिता का शुरुआती ज्ञान लिया। इसके बाद उन्होंने कई संस्थानों के लिए फ्रीलांसिग की। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों के लिए जारी होने वाली धनराशि में घोटाले का खुलासा, सरकारी राशन वितरकों द्वारा 'राशन चोरी' का भंड़ाफोड़ किया, साथ ही किसान आंदोलन की ग्राउंड रिपोर्टिंग की। इसके बाद साल 2022 में दैनिक जागरण के डिजिटल विंग में बतौर सब एडिटर के पद पर अपने करियर की औपचारिक शुरुआत की। यहां उन्होंने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की डेस्क पर अपनी पकड़ मजबूत की। बेहतरीन लेखनी और कार्य के प्रति समर्पण को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने उन्हें 2024 में वरिष्ठ उप संपादक के पद पर प्रमोट किया। दैनिक जागरण में रहते हुए उन्होंने, खबरों का संपादन, एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया। इसके बाद अभिषेक पाण्डेय ने जुलाई 2025 में नवभारत टाइम्स के साथ अपनी पारी की शुरुआत की।
शिक्षा/पुरस्कार
मूल रूप से कानपुर से जुड़े अभिषेक पाण्डेय ने रामा यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन किया है। दैनिक जागरण में उन्हें तीन बार बेस्ट परफॉर्मर ऑफ द मंथ से सम्मानित किया गया था।... और पढ़ें
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