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45 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दी उम्रकैद के बाद के आरोपी को न्याय, 49 वर्ष पुराना मर्डर केस

उत्तर प्रदेश के 1977 के हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने 45 साल बाद तीन आरोपियों को बेगुनाह घोषित किया है। एक आरोपी पहले ही जेल में पूरी उम्रकैद काटकर जेल से रिहाई अनुभव कर चुका है, और यूपी सरकार ने उसकी सजा माफ भी कर रखी है।

17 जुलाई 2026 को 03:14 am बजे
45 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दी उम्रकैद के बाद के आरोपी को न्याय, 49 वर्ष पुराना मर्डर केस

सौजन्य से:- Hindustan

ये कैसा इंसाफ? सुप्रीम कोर्ट ने जिसे 45 साल बाद कहा बेगुनाह, वो जेल में काट चुका पूरी उम्रकैद

यूपी के 1977 मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने 45 साल बाद ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 3 आरोपियों को बरी किया। कोर्ट ने पुलिस की थ्योरी को खारिज किया, लेकिन एक आरोपी पहले ही उम्रकैद काट चुका है।

न्याय मिलने में देरी कैसे किसी की पूरी जिंदगी पर भारी पड़ सकती है, यह यूपी के एक 49 साल पुराने मर्डर केस में साबित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने 1977 के एक हत्याकांड में तीन आरोपियों को 45 साल बाद बेगुनाह करार दिया है। हालांकि, न्याय की यह जीत इसलिए फीकी पड़ गई क्योंकि एक आरोपी अपनी उम्रकैद की सजा पहले ही काट चुका है और यूपी सरकार द्वारा सजा माफ किए जाने के बाद ही वह जेल से बाहर आ सका।

क्या है पूरा मामला और क्या हुआ आरोपियों के साथ?

यह पूरा मामला 28 जून 1977 में उत्तर प्रदेश में हुए एक हत्याकांड से जुड़ा है। साल 1981 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था।

इस लंबे कानूनी संघर्ष के दौरान कुल आरोपियों में से दो की पहले ही मौत हो चुकी है। बचे हुए तीन आरोपियों में से दो को साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई थी, लेकिन एक आरोपी 'हीरा लाल' की जमानत याचिका खारिज हो गई थी।

जमानत न मिलने के कारण हीरा लाल को अपनी उम्रकैद की पूरी सजा जेल में काटनी पड़ी। यूपी सरकार द्वारा सजा माफ किए जाने के बाद ही उसे जेल से रिहाई मिल पाई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? पुलिस की थ्योरी और गवाही पर उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस और सरकारी वकील की थ्योरी में कई गंभीर खामियां पाईं। कोर्ट ने गवाहों के बयानों में भारी विसंगतियां मिलने के बाद आरोपियों को 'संदेह का लाभ' देते हुए बरी कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कथित चश्मदीदों की गवाही मानने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को ठोस माना कि घटना उस तरह से नहीं हुई जैसी पुलिस ने अपनी कहानी में बताई थी। कोर्ट ने कहा कि बचाव पक्ष की दलीलों को महज 'काल्पनिक या सट्टा' कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

'चश्मदीदों का घटनास्थल पर होना असंभव लगता है'

अदालत ने अपने कड़े फैसले में स्पष्ट किया, "अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा है कि यह घटना 28 जून 1977 की दोपहर को हुई थी, या बिल्कुल वैसे ही हुई थी जैसा कि कथित चश्मदीदों ने दावा किया है।"

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटनास्थल पर इन चश्मदीदों की मौजूदगी न सिर्फ संदिग्ध है, बल्कि बेहद असंभव लगती है। इतने अनिश्चित और अविश्वसनीय सबूतों पर पुलिस का केस नहीं टिक सकता।

शीर्ष अदालत ने निचली अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट के रवैये पर भी सवाल खड़े किए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों से ही इन अहम खामियों को नजरअंदाज करने की चूक हुई। उन्होंने बेहद संदिग्ध गवाहों की गवाही पर भरोसा करके आरोपियों को दोषी ठहराने की बड़ी गलती की, जबकि आरोपी इसके बजाय संदेह का लाभ पाने के हकदार थे।

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अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।

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