हाई कोर्ट की टिप्पणी: वरिष्ठ नागरिक कानून पर दुरुपयोग, संपत्ति विवाद नहीं सुलझाए जा सकते
उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ नागरिक कानून को सामान्य संपत्ति विवादों के लिए इस्तेमाल करने की जागरूकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का उपयोग न केवल संपत्ति विवादों के निपटारे के लिए नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह केवल उन मामलों में उपयोग किया जा सकता है जहां वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति के हस्तांतरण को निरस्त करने के लिए आवश्यक शर्तें पूरी हों।

सौजन्य से:- Live Hindustan
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Dinesh Rathourप्रयागराज, विधि संवाददाता
हमीरपुर के सतीश चंद्र गुप्ता की याचिका खारिज करते हुए पर न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति के स्वामित्व, वसीयत या बिक्री विलेख की वैधता को लेकर विवाद है, तो उसका निर्णय केवल सक्षम सिविल न्यायालय ही कर सकता है।
Allahabad Highcourt Decision: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 का उपयोग सामान्य संपत्ति विवादों के निपटारे के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल, अपीलीय ट्रिब्यूनल अथवा जिला मजिस्ट्रेट को किसी व्यक्ति को संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार नहीं है, सिवाय उन मामलों के जहां अधिनियम की धारा 23 लागू होती हो।
हमीरपुर के सतीश चंद्र गुप्ता की याचिका खारिज करते हुए पर न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति के स्वामित्व, वसीयत या बिक्री विलेख की वैधता को लेकर विवाद है, तो उसका निर्णय केवल सक्षम सिविल न्यायालय ही कर सकता है। ऐसे जटिल शीर्षक (टाइटल) संबंधी विवादों का निस्तारण वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल नहीं कर सकता।
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अदालत ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना है, न कि संपत्ति संबंधी प्रत्येक विवाद के लिए समानांतर न्यायिक व्यवस्था खड़ी करना। कानून की मंशा वरिष्ठ नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा देना है, लेकिन इससे सामान्य दीवानी न्यायालयों के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 21 तथा उत्तर प्रदेश नियमावली, 2014 के नियम 21 और 22 के तहत जिला मजिस्ट्रेट तथा पुलिस प्रशासन का दायित्व केवल वरिष्ठ नागरिकों के जीवन एवं संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना, शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करना, समन्वय स्थापित करना और सुरक्षा संबंधी उपाय लागू करना है। इन प्रावधानों से जिला मजिस्ट्रेट को किसी व्यक्ति को बेदखल करने या संपत्ति संबंधी अधिकारों का निर्णय देने की शक्ति प्राप्त नहीं होती।
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खंडपीठ ने पूर्णपीठ के निर्णय ‘ओंकार नाथ गौर बनाम जिला मजिस्ट्रेट’ (2025) का हवाला देते हुए कहा कि केवल धारा 23 के अंतर्गत, जब कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति इस शर्त पर हस्तांतरित करता है कि हस्तांतरण प्राप्त करने वाला उसकी मूलभूत आवश्यकताओं और देखभाल का दायित्व निभाएगा तथा वह ऐसा करने में विफल रहता है, तभी ट्रिब्यूनल उस हस्तांतरण को निरस्त घोषित कर सकता है। ऐसी स्थिति में संपत्ति का कब्जा वरिष्ठ नागरिक को वापस दिलाने का आदेश भी दिया जा सकता है। अदालत ने कहा कि धारा 23 लागू होने के लिए तीन आवश्यक शर्तें हैं-संपत्ति का हस्तांतरण वरिष्ठ नागरिक द्वारा किया गया हो, हस्तांतरण देखभाल एवं मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की शर्त पर हुआ हो तथा हस्तांतरण प्राप्त करने वाला उस शर्त का पालन करने में विफल रहा हो। इन शर्तों के अभाव में ट्रिब्यूनल को संपत्ति विवाद सुनने का अधिकार नहीं है।
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कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता ने कहीं भी यह दावा नहीं किया कि संपत्ति का हस्तांतरण देखभाल की शर्त पर हुआ था। इसके विपरीत वह वसीयत और दो बिक्री विलेखों की वैधता पर प्रश्न उठा रहा है, जिनका निर्णय विस्तृत साक्ष्य और सुनवाई के बाद केवल सिविल न्यायालय ही कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत गठित प्राधिकरणों को सिविल अदालतों के अधिकार नहीं दिए गए हैं और वे संपत्ति के स्वामित्व या दस्तावेजों की वैधता का निर्णय नहीं कर सकते। अधिनियम की धारा 3 के तहत प्राप्त वरीयता भी केवल उन्हीं विषयों तक सीमित है जिनकी सुनवाई का अधिकार अधिनियम विशेष रूप से देता है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि पूर्णपीठ पहले ही ‘शिवानी वर्मा बनाम राज्य’ के उस निर्णय को निरस्त कर चुकी है जिसमें जिला मजिस्ट्रेट को व्यापक अधिकार मान लिए गए थे। इसलिए उस निर्णय के आधार पर संपत्ति विवादों के निस्तारण की मांग अब स्वीकार नहीं की जा सकती। इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पक्षकार यदि चाहें तो अपनी शिकायत के समाधान के लिए सक्षम सिविल न्यायालय या अन्य विधिक मंच का सहारा ले सकते हैं।
दिनेश राठौर वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। डिजिटल और प्रिंट पत्रकारिता में 13 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश ने अपने करियर की शुरुआत 2010 में हरदोई से की थी। कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक दिनेश ने अपने सफर में हिन्दुस्तान (कानपुर, बरेली, मुरादाबाद), दैनिक जागरण और राजस्थान पत्रिका (डिजिटल) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। हरदोई की गलियों से शुरू हुआ पत्रकारिता का सफर आज डिजिटल मीडिया के शिखर तक पहुँच चुका है। दिनेश राठौर ने यूपी और राजस्थान के विभिन्न शहरों की नब्ज को प्रिंट और डिजिटल माध्यमों से पहचाना है।
लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में कार्यरत दिनेश दिनेश, खबरों के पीछे की राजनीति और सोशल मीडिया के ट्रेंड्स (वायरल वीडियो) को बारीकी से विश्लेषण करने के लिए जाने जाते हैं।
पत्रकारिता का सफर
हरदोई ब्यूरो से करिअर की शुरुआत करने के बाद दिनेश ने कानपुर हिंदुस्तान से जुड़े। यहां बतौर स्ट्रिंगर डेस्क पर करीब एक साल तक काम किया। इसके बाद वह कानपुर में ही दैनिक जागरण से जुड़े। 2012 में मुरादाबाद हिंदुस्तान जब लांच हुआ तो उसका हिस्सा भी बने। करीब दो साल यहां नौकरी करने के बाद दिनेश राजस्थान पत्रिका से जुड़ गए। सीकर जिले में दिनेश ने करीब तीन साल तक पत्रकारिता की। उन्होंने एक साल तक डिजिटल का काम भी किया। 2017 में दिनेश ने बरेली हिंदुस्तान में प्रिंट के डेस्क पर वापसी की। लगभग दो साल की सेवाओं के बाद डिजिटल हिंदुस्तान में काम करने का मौका मिला जिसका सफर जारी है।
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