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फांसी की जगह मौत का इंजेक्शन देने की मांग! सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

फांसी की जगह मौत का इंजेक्शन देने की मांग! सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला सर्वोच्च अदालत ने इस मामले से जुड़े तीन पुराने फैसलों (दीना बनाम भारत संघ) को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि इ…

18 अगस्त 2026 को 08:55 am बजे
फांसी की जगह मौत का इंजेक्शन देने की मांग! सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

सौजन्य से:- Hindustan

फांसी की जगह मौत का इंजेक्शन देने की मांग! सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

सर्वोच्च अदालत ने इस मामले से जुड़े तीन पुराने फैसलों (दीना बनाम भारत संघ) को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि इसके लिए कोई ठोस आधार नहीं है।

मौत की सजा दिए जाने के लिए फांसी की जगह कम दर्दनाक और अधिक मानवीय तरीकों जैसे लीथल इंजेक्शन को अपनाने की मांग करने वाली जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने साफ किया कि फिलहाल देश में फांसी के जरिए ही मृत्युदंड देने की व्यवस्था संवैधानिक रूप से वैध और प्रभावी रहेगी।

सर्वोच्च अदालत ने इस मामले से जुड़े तीन पुराने फैसलों (दीना बनाम भारत संघ) को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि इसके लिए कोई ठोस आधार नहीं है।

याचिका में क्या तर्क दिए गए थे?

सीनियर वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर की गई इस जनहित याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) अब BNSS की धारा 393(5) की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि फांसी के जरिए मृत्युदंड देना बेहद दर्दनाक, क्रूर और अमानवीय है। संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत सम्मानजनक मौत का अधिकार भी शामिल होना चाहिए।

याचिका में कहा गया था कि फांसी के बाद किसी कैदी को मृत घोषित करने में लगभग 40 मिनट लग जाते हैं। इसके विपरीत गोली मारने, जहरीला इंजेक्शन, इलेक्ट्रॉक्यूशन या गैस चैंबर जैसे तरीकों से 5 मिनट के भीतर व्यक्ति की मौत हो जाती है।

याचिका में संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रस्ताव का हवाला दिया गया था, जिसमें कहा गया है कि जहां मृत्युदंड लागू है, वहां उसे न्यूनतम कष्ट देने वाले तरीके से अंजाम दिया जाना चाहिए।

भविष्य के लिए रास्ते बंद नहीं: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने अपने फैसले में यह साफ कर दिया कि उसका यह निर्णय भविष्य के वैज्ञानिक और मेडिकल अध्ययनों के रास्ते बंद नहीं करता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "इस याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में अगर कोई ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या व्यावहारिक साक्ष्य सामने आते हैं, तो इस विषय की संवैधानिक समीक्षा नहीं की जा सकती।"

अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार अगर चाहे तो कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन और न्यूरोसाइंस के विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर फांसी के विकल्प और दूसरे तरीकों के प्रभाव पर विस्तृत समीक्षा कर सकती है।

केंद्र सरकार ने क्या कहा?

अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पूर्व में अदालत को बताया था कि केंद्र सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रही है और एक समिति का गठन भी किया गया है।

हालांकि, सुनवाई के दौरान जब कैदियों को फांसी या जहरीले इंजेक्शन में से चुनने का विकल्प देने की बात उठी थी, तो केंद्र ने अपने हलफनामे में इसे 'व्यवहारिक रूप से संभव नहीं' बताया था। वहीं, अन्य कानूनी विशेषज्ञों ने अमेरिका में लीथल इंजेक्शन से जुड़ी विफलता की घटनाओं का हवाला देते हुए फांसी को ही सबसे सुरक्षित और त्वरित तरीका बताया।

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